पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १८८ ) पञ्चतन्त्रम् । “सूर्य, चन्द्रमा, पवन, अग्नि, स्वर्ग, पृथ्वी, जल, हृदय, यम, दिनरात्रि, दोनों संध्या और धर्म मनुष्यके कर्तव्यको जानता है ॥ ४३८ ॥ भगवति वनदेवते ! आवयोर्मध्ये यः चौरः त्वं कथय” . अथ पापबुद्धिपिता शमीकोटरस्थः प्रोवाच-“भोः ! शृणुत शृणुत धर्मबुद्धिना हतमेतद्धनम्”। तदाकर्ण्य सर्वे ते राज- पुरुषा विस्मयोत्फुल्ललोचना यावद्धर्मबुद्धेः वित्तहरणोचितं निग्रहं शास्त्रदृष्ट्या अवलोकयन्ति तावद्धर्मबुद्धिना तच्छ- मीकोटरं वह्निभोज्यद्रव्यैः परिवेष्ट्य वह्निना सन्दीपितम् । अथ ज्वलति तस्मिन् शमीकोटरेऽर्द्धदग्धशरीरः स्फुटिते- क्षणः करुणं परिदेवयन् पापबुद्धिपिता निश्चक्राम । ततश्च तैः सर्वैः पृष्टः-“भोः ! किमिदम् ?” इत्युक्ते स पापबुद्धिवि- चेष्टितं सर्व्वमिदं निवेदयित्वा उपरतः । अथ ते राजपुरुषाः पापबुद्धिं शमीशाखायां प्रतिलम्ब्य धर्मबुद्धिं प्रशस्य इद्- मूचुः-“अहो ! साधु चेदमुच्यते- भगवति वनदेवते ! हम दोनोंके बीचमें जो चोरहो उसको तुम कहो” तब पापबुद्धिका पिता शमीकी खखोडलमेंसे बोला--“भो ! सुनो २ यह धन धर्मबुद्धिने हरण किया है” यह सुनकर वे सब राजपुरुष विस्मयसे खिले नेत्रवाले जबतक धर्मबुद्धिको धनहरणके उचित दंडको शास्त्रदृष्टिसे देखते हैं तबतक धर्मबुद्धिने उस शमीकी खखोडल अग्निभोज्य ( तृणादि ) द्रव्यसे ढककर उसमें आग लगादी । तब उस शमीकोटरके जलनेपर अर्ध दग्धशरीरवाला नेत्रफूटा करु- णास्वरसे चिल्लाता हुआ पापबुद्धिका पिता निकला. तब उन सबने पूछा-- “भोः ! यह क्या है ?” । ऐसा कहनेपर वह इस सब पापबुद्धिकी चेष्टाको निवेदन कर मरगया । तब वे राजपुरुष पापबुद्धिको शर्माशाखामें बांधकर धर्मबु- द्धिकी प्रशंसा कर यह बोले--“अहो ! यह सत्य कहा है- उपायं चिन्तयेत्प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् । पश्यतो बकमूर्खस्य नकुलेन हता बकाः ॥ ४३९ ॥” बुद्धिमान् उपायकी चिन्ता कर अपायकीभी चिन्ता करे । मूर्ख बगलेके देखते नौलेने उसके बच्चे खालिये ॥ ४३९ ॥”