भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( १९० ) पञ्चतन्त्रम् । मक्खनकी समानः वाणी और निर्दय चित्त करके शत्रुको इस प्रकार समझावे जिससे वंशसहित शत्रु मरजाय ॥ ४४० ॥ आह च,–“माम ! यदि एवं तत् मत्स्यमांसखण्डानि नकुलस्य बिलद्वारात् सर्पकोटरं यावत् प्रक्षिप यथा नकुलस्तन्मार्गेण गत्वा तं दुष्टसर्पं विनाशयति” । अथ तथा अनुष्ठिते मत्स्यमांसानुसारिणा नकुलेन तं कृष्ण- सर्पं निहत्य तेऽपि तद्वृक्षाश्रयाः सर्वे बकाश्च शनैः शनैर्भक्षिताः । अतो वयं ब्रूमः “उपायं चिन्तयेदिति” । बोलाभी–“मामा ! यदि ऐसा है तो मत्स्योंके मांसखण्ड नकुलके बिलके द्वारसे सांपकी खखोडलपर्यन्त डालो जो नौला उसमार्गसे जाकर उस दुष्ट सर्पको मारेगा” वैसा अनुष्ठान करनेपर मछलियोंके मांसानुसारी नौलेने उस काले सर्पको मारकर और वेभी उस वृक्षपर रहनेवाले सब बगले भी शनैः २ भक्षण कर लिये । इससे हम कहते हैं “उपाय विचारे इत्यादि” । तदनेन पापबुद्धिना उपायश्चिन्तितो नापायः । ततस्त- त्फलं प्राप्तम् । सो इस पापबुद्धिने उपाय विचारा अपाय नहीं सो इसका यह फल है । धर्मबुद्धिः कुबुद्धिश्च द्वावेतौ विदितौ मम । पुत्रेण व्यर्थपाण्डित्यात्पिता धूमेन घातितः ॥ ४४१ ॥ धर्मबुद्धि और कुबुद्धि यह दोनों मैने जाने, वृथा पाण्डित्यसे पिताको धूमसे पुत्रने मारडाला ॥ ४४१ ॥ एवं मूढ ! त्वयापि उपायश्चिन्तितो नापायः पापबुद्धिवत् । तन् न भवसि त्वं सज्जनः, केवलं पापबुद्धिरसि, ज्ञातो मया स्वामिनः प्राणसन्देहानयनात् । प्रकटीकृतं त्वया स्वयमे- वात्मनो दुष्टत्वं कौटिल्यञ्च । अथवा साधु चेदमुच्यते- सो हे मूढ ! तैनेभी उपायकी चिन्ता करी अपायकी नहीं । सो तू सज्जन नहीं केवल पापबुद्धि है जाना मैने स्वामीके प्राणसन्देहकी अनयसे प्रगट की या तुमने स्वयंही अपनी दुष्टता और कुटिलता । अथवा अच्छा कहा है-