भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( १९२ ) पञ्चतन्त्रम् । जिस अहंकारयुक्तने प्रथम बहुत समयतक विलास किया है और जो उसी स्थानमें दीन वचन कहे वह निन्दित होता है ॥ ४४५ ॥” तस्य च गृहे लोहभारघटिता पूर्वपुरुषोपार्जिता तुला- आसीत् । ताञ्च कस्यचित् श्रेष्ठिनो गृहे निक्षेपभूतां कृत्वा देशान्तरं प्रस्थितः । ततः सुचिरं कालं देशान्तरं यथेच्छया भ्रान्त्वा पुनः स्वपुरमागत्य तं श्रेष्ठिनमुवाच,-“भोः श्रेष्ठिन् ! दीयतां मे सा निक्षेपतुला” । स आह-“भो ! नास्ति सा त्वदीया तुला मूषिकैर्भक्षिता” । जीर्णधन आह-“भोः श्रेष्ठिन् ! नास्ति दोषस्ते यदि मूषिकैः भक्षितेति । ईदृक्- एवायं संसारः । न किञ्चिदत्र शाश्वतमस्ति, परमहं नद्यां स्नानार्थं गमिष्यामि, तत् त्वमात्मीयं शिशुमेनं धनदेवनामानं मया सह स्नानोपकरणहस्तं प्रेषय” इति । सोऽपि चौर्य्यभया- त्तस्य शङ्कितः स्वपुत्रमुवाच-“वत्स ! पितृव्योऽयं तव स्नानार्थं नद्यां यास्यति तद्गम्यतामनेन सार्द्धं स्नानोपकरणमादाय ” इति । अहो ! साधु इदमुच्यते- उस घरमें लोहभार वाली वृद्ध पुरुषोंकी उपार्जित एक तराजू थी उसको किसी सेठके घरमें धरोहर रखकर देशन्तरको गया । और बहुतकालतक देशा- न्तरमें यथेच्छ भ्रमण कर फिर अपने पुरमें आकर श्रेष्ठीसे वह बोला,-“भो सेठ ! हमारी निक्षेपतुला (धरोहरकी तराजू) दो” वह बोला,-“भो वह तुम्हारी तराजू नहीं है चूहोंने खाली” । जीर्णधन बोला,-“सेठजी ! इसमें आपका दोष क्या यदि चूहोंने खाली, इसी प्रकारका यह संसार है कोई यहां निरन्तर रहनेवाला नहीं है । परन्तु मैं नदीमें स्नान करने जाऊंगा । सो तुम अपने इस बालकधन- देवको मेरे साथ स्नानीय द्रव्यके सहित भेज दीजिये,” वहभी चोरीके भयसे शंकित हो अपने पुत्रसे बोला--“वत्स ! यह तुम्हारे चचा स्नानके निमित्त नदीको जायंगे सो इनके साथ स्नानीय पदार्थ लेकर जाओ” इति । अहो ! यह अच्छा कहा है- न भक्त्या कस्यचित्कोऽपि प्रियं प्रकुरुते नरः । मुक्त्वा भयं प्रलोभं वा कार्य्यकारणमेव वा ॥ ४४६ ॥

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