भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( ६ ) पञ्चतन्त्रम् । तन्त्रोंको निर्माणकर उन राजकुमारोंको पढ़ाये । वेभी उनको पढ़कर छः महीनेमें, जैसा कहाथा वैसेहुए । उस दिनसे यह पंचतन्त्र नामक नीतिशास्त्र बालकोंके- ज्ञानके निमित्त पृथ्वीमें विख्यात हुआहै बहुत क्या- अधीते य इदं नित्यं नीतिशास्त्रं शृणोति च । न पराभवमाप्नोति शक्रादपि कदाचन ॥ १० ॥ कथामुखमेतत् । जो इस नीतिशास्त्रको पढता और सुनताहै, वह कभी इन्द्रसेभी पराभवको प्राप्त नहीं होताहै ॥ १० ॥ इति पण्डितज्वालाप्रसादमिश्रकृतायां पञ्चतंत्रभाषाटीकायां कथामुखं समाप्तम् । अथ मित्रभेदोनाम प्रथमं तंत्रम् । अथातः प्रारभ्यते मित्रभेदा नाम प्रथमं तन्त्रम् । यस्याय- मादिमः श्लोकः- इसके अनन्तर मित्रभेद नामवाला प्रथम तन्त्रका प्रारम्भ करते हैं । जिसकी आदिमें यह श्लोकहै- वर्द्धमानो महान्स्नेहः सिंहगोवृषयोर्वने । पिशुनेनातिलुब्धेन जम्बुकेन विनाशितः ॥ १ ॥ सिंह और बैलका वनमे वढाहुआ महास्नेह चुगुल लालची जम्बुक (गिदड) ने विनाशकर दिया ॥ १ ॥ तद्यथा अनुश्रूयते-अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे महिलारोप्यं नाम नगरम् । तत्र धर्मोपार्जितभूरिविभवो वर्द्धमानको नाम वणिक्पुत्रो बभूव । तस्य कदाचिद्रात्रौ शय्यारूढस्य चिन्ता समुत्पन्ना । "यत्प्रभूतेऽपि वित्ते अर्थोपायाश्चिन्तनीयाः कर्त्त- व्याश्चेति । यत उक्तञ्च- सो यह सुनाजाता है कि, दक्षिण देशमें महिलारोप्यनाम एक नगर है वहां धर्मसे महाधन उपार्जन कर्ता वर्द्धमान नामक वणिक् पुत्र था। उसको एक समय