भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । (१९५) सो मूर्ख ! सजीवककी प्रसन्नता न सहनेवाले तैने यह किया । अहो अच्छा कहा है कि- प्रायेणात्र कुलान्वितं कुकुलजाः श्रीवल्लभं दुर्भगा दातारं कृपणा ऋजूननृजवो वित्ते स्थितं निर्धनाः । वैरूप्योपहताश्च कान्तवपुषं धर्माश्रयं पापिनो नानाशास्त्रविचक्षणञ्च पुरुषं निन्दन्ति मूर्खाः सदा॥४४९॥ बहुधा इस जगत्में खोटे कुलमें उत्पन्न हुए कुलीनोंकी, दुर्भागी भाग्यवान् पुरुषोंकी, कंजूस दाताओंकी, कुटिल सीधोंकी, निर्धनी धनियोंकी, विरूप सुन्द- रोंकी, पापी धर्मात्माओंकी, मूर्ख नाना शास्त्रमें चतुर पुरुषोंकी सदा निन्दा करते हैं ॥ ४४९ ॥ तथाच- तैसेही- मूर्खाणां पण्डिता द्वेष्या निर्धनानां महाधनाः । व्रतिनः पापशीलानामसतीनां कुलस्त्रियः ॥ ४५० ॥ मूर्ख पंडितोंसे सदा द्वेष करते हैं, निर्धन धनवानोंसे, पापात्मा व्रतवालोंसे, असती कुलस्त्रियोंसे सदा द्वेष करती हैं ॥ ४५० ॥ तन्मूर्ख ! त्वया हितमपि अहितं कृतम् । उक्तञ्च- सो हे मूर्ख ! तने हितभी अहित किया. कहा है- पण्डितोऽपि वरं शत्रुर्न मूर्खो हितकारकः । वानरेण हतो राजा विप्राश्चौरेण रक्षिताः ॥ ४५१ ॥ पंडित शत्रुभी अच्छा, हितकारी मूर्ख भला नहीं वानरने राजाको मारा और ब्राह्मणोंकी चौरने रक्षा की ॥ ४५१ ॥ दमनक आह-"कथमेतत् ?" सोऽब्रवीत्- दमनक बोला-"यह कैस ?" वह बोला- कथा २२. कस्यचित् राज्ञो नित्यं वानरोऽतिभक्तिपरोऽङ्गसेवकोऽ- न्तःपुरेऽपि अप्रतिषिद्धप्रसरोऽतिविश्वासस्थानमभूत् । एकदा राज्ञो निद्रां गतस्य वानरे व्यजनं नीत्वा वायुं विदधति