भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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अथ मित्रसम्प्राप्तिर्नाम द्वितीयं तन्त्रम् । अथ इदमारभ्यते मित्रसम्प्राप्तिर्नाम द्वितीयं तन्त्रं तस्य अयमाद्यः श्लोकः- अब यह आरंभ किया जाता है मित्रसम्प्राप्ति नामवाले दूसरे तंत्रके जिसका- यह पहिला श्लोक है- असाधना अपि प्राज्ञा बुद्धिमन्तो बहुश्रुताः । साधयन्त्याशु कार्याणि काकाखूमृगकूर्मवत् ॥ १ ॥ निरुपायभी विद्वान् बुद्धिमान् बहुत शास्त्रदर्शी शीघ्र अपने कार्यको काक चूहे मृग कच्छपकी समान सिद्ध करते हैं ॥ १ ॥ तद्यथा अनुश्रूयते- सो यों सुना है- अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे महिलारोप्यं नाम नग- रम् । तस्य न अतिदूरस्थो महोच्छ्रायवान् नानाविहं- गोपभुक्तफलः कीटैरावृतकोटरः छायाश्वासितपथिक- जनसमूहो न्यग्रोधपादपो महान् । अथवा युक्तम्- कि, दक्षिणके देशमें महिलारोप्य नाम नगर है, उसके निकटही बडी छाया- वाला अनेक पक्षियोंसे फल खाया हुआ, कीटोंसे भरीखोडळवाला छायामें पथिक जनोंको आश्वासन देनेवाला एक बडा न्यग्रोध (वट) का पेड है । अथवा कहा है-

  • छायासुप्तमृगः शकुन्तनिवहैर्विष्वग् विलुप्तच्छदः कीटैरावृतकोटरः कपिकुलैः स्कन्धे कृतप्रश्रयः । विश्रब्धं मधुपैर्निपीतकुसुमः श्लाघ्यः स एव द्रुमः । सर्वाङ्गैर्बहुसत्त्वसङ्गसुखदो भूभारभूतोऽपरः ॥ २ ॥
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