भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( २०६ ) पश्चतन्त्रम् । तन्तवोऽप्यायता नित्यं तन्तवो बहुलाः समाः । बहून्बहुत्वादायासात्सहन्तीत्युपमा सताम् ॥ ८ ॥” तन्तुभी नित्य विस्तीर्ण हैं और बहुतसे तुल्यरूप तन्तु बहुतसे परिश्रमोंको सहन कर लेते हैं, यही महात्माओंकी उपमा है ॥ ८ ॥” तथानुष्ठिते लुब्धको जालमादाय आकाशे गच्छतां तेषां पृष्ठतो भूमिस्थोऽपि पर्य्यधावत । तत ऊर्द्धाननः श्लोक- मेनमपठत्– वैसा करने पर वह लुब्धक जालको लेकर आकाशमें जाते हुए उनके पीछे पृथ्वीमें स्थित हुआभी धावमान हुआ। और ऊपरको मुखकर यह श्लोक पढ़ने लगा- जालमादाय गच्छन्ति संहताः पक्षिणोऽप्यमी । यावच्च विवदिष्यन्ते पतिष्यन्ति न संशयः ॥ ९ ॥ मिले हुए यह पक्षी मेरे जालको लेकर उड़ते हैं और जब पतित होंगे तब सब मेरे वशमें हो जांयगे ॥ ९ ॥ लघुपतनकोऽपि प्राणयात्राक्रियां त्यक्त्वा किमत्र भविष्य- तीति कुतूहलात् तत्पृष्ठलग्नोऽनुसरति । अथ दृष्टेरगोचरतां गतान् विज्ञाय लुब्धको निराशः श्लोकमपठन् निवृत्तश्च । लघुपतनकभी आजीविकाको छोड़कर इसमें क्या होगा इस कुतूहलसे उसके पीछे लगा चला । तब उनके दृष्टिपथसे अतीत होनेपर उन्हें गया जानकर लुब्धक यह श्लोक पढता हुआ। निवृत्त हुआ– न हि भवति यन्न भाव्यं भवति च भाव्यं प्रयत्नेन । करतलगतमपि नश्यति यस्य हि भवितव्यता नास्ति १०॥ “जो नहीं होनहार है वह नहीं होती जो होनहार है वह यत्नसे होतीही है जिसकी भावी ( होनहार ) नहीं है हाथमें स्थित हुआ भी वह पदार्थ नष्ट हो जाता है ॥ १० ॥ तथाच– तैसेही पराङ्मुखे विधौ चेत्स्यात्कथञ्चिद्द्रविणोदयः । तत्ततोऽन्यदपि संगृह्य याति शंखनिधिर्यथा ॥ ११ ॥