पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
पृष्ठ 23, कुल 536 में से
संदर्भ में पढ़ें( ८ ) पञ्चतन्त्रम् । भोजन करनेसे जैसे सब इन्द्रिय ( समर्थ होती हैं ) इसीप्रकार सम्पूर्ण कार्य धनसे ( होते हैं ), इस कारणसे धन सबका साधन कहा जाता है ॥ ८ ॥ अर्थार्थी जीवलोकोऽयं श्मशानमपि सेवते । त्यक्त्वा जनयितारं स्वं निःस्वं गच्छति दूरतः ॥ ९ ॥ धनकी इच्छासे यह प्राणी श्मशानकोभी सेवन करता है, निर्धन अपने उत्पन्न करनेवालेको भी छोडकर दूर जाता है ॥ ९ ॥ गतवयसामपि पुंसां येषामर्था भवन्ति ते तरुणाः । अर्थेन तु ये हीना वृद्धास्ते यौवनेऽपि स्युः ॥ १० ॥ वृद्ध पुरुषोंमेभी जिनके धन हैं वे तरुण हैं, जो धनसे हीन हैं, वे युवा अव- स्थामें ही वृद्ध होते हैं ॥ १० ॥ स चार्थः पुरुषाणां षड्भिरुपायैर्भवति भिक्षया, नृप- सेवया, कृषिकर्मणा, विद्योपार्जनेन, व्यवहारेण, वणिक्क- र्मणा वा । सर्वेषामपि तेषां वाणिज्येन अतिरस्कृतोऽर्थलाभः स्यात् । उक्तञ्च यतः- वह धन पुरुषोंको छः उपायोंसे मिलता है, भिक्षा, राजसेवा, खेतीका कार्य, विद्याउपार्जन, लेनदेन वा वणिक्कर्मसे । इन सबमें वाणिज्यसे सर्वसम्मत लाभ होता है । कृता भिक्षाऽनेकैर्र्वितरति नृपो नोचितमहो कृषिः क्लिष्टा विद्या गुरुविनयवृत्त्यातिविषमा । कुसीदाद्दारिद्र्यं परकरगतग्रन्थिशमना- न्न मन्ये वाणिज्यात्किमपि परमं वर्त्तनमिह ॥ ११ ॥ अनेक पुरुषोंने भिक्षा की है, राजाभी, योग्य वृत्ति नहीं देता है, खेती क्लेशदायिनी है, विद्या गुरुकी विनयवृत्तिसे अति विषम है, व्याजसे भी दारिद्र होता है, कारण कि, दूसरेके १ हाथमे आनेसे ग्रन्थिशमन हो जाय, वाणिज्यसे अधिक कोईभी जीवनोपाय नहीं मानताहूं । शिखरिणी छन्द है ॥ ११ ॥ उपायानाञ्च सर्वेषामुपायः पण्यसंग्रहः । धनार्थ शस्यते ह्येकस्तदन्यः संशयात्मकः ॥ १२ ॥ १ कोई धरोहर मारले ।