पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (२२३)
वृष्टिसे दुर्भिक्ष होगयाहै दुर्भिक्षसे भूखसे पीडित कोई मनुष्य बलिमात्रभी नहीं देताहै और घरघरमें भूखे जनोंने पक्षियोंके बाधनेको पाशे लगा रक्खेहैं मैभी 'आयुके शेष रहनेसे पाशसे बधकर निकल आया, यह वैराग्यका कारण है इससे मैं विदेशको चला इसकारण असू त्यागताहू" । हिरण्यक बोला,-“तो आप कहा जायगे?"। वह बोला-“दक्षिणदिशामें गहनवनके मध्यमें बडा सरोवर है। वहा तुमसेभी अधिक परम सुहृत् कूर्म मन्थरक नामवालाहै, वह मुझे मत्स्योंके मासखण्ड देगा । उनको भक्षण करता उसके सग सुन्दर आलापका सुख अनुभव करता सुखने समय बिताऊगा, मै यहां पक्षियोंकी पाश वधनासे क्षय -देखनेको असमर्थ हू । कहाहै- अनावृष्टिहते देशे शस्ये च प्रलयं गते । धन्यास्तात न पश्यन्ति देशभङ्गं कुलक्षयम् ॥ ५७ ॥ देशके अनावृष्टिसे क्षय होनेमें; धान्यके नष्ट होनेमें, तथा देशभंग और कुलके क्षयको नहीं देखतेहैं वेही हे तात ! धन्यहैं ॥ ५७ ॥ कोऽतिभारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम् । को विदेशः सविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम् ॥ ५८ ॥ समर्थ पुरुषोंको क्या महत्कार्य है, व्यापारियोको क्या दूरहै, विद्वानोको कौन- स विदेशहै और प्रियवादियोंको कौन दूसराहै कोई नहीं है ॥ ५८ ॥ विद्वत्वञ्च नृपत्वञ्च नैव तुल्यं कदाचन । स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान्सर्वत्र पूज्यते ॥ ५९ ॥ " विद्वत्ता और राजापन कभी बराबर नहीं होसक्ते राजा अपने देशमें ही पूजित होताहै और विद्वान् सर्वत्र पूजित होताहै ॥ ५९॥" हिरण्यक आह,-“यदि एवं तदहमपि त्वया सह गमि- ष्यामि । ममापि महद्दुःखं वर्त्तते” । वायस आह,-“भोः! तव किं दुःखम् ? तत्कथय” । हिरण्यक आह,-“भोः ! बहु- वक्तव्यमस्ति अत्र विषये । तत्र एव गत्वा सर्वं सवि- स्तरं कथयिष्यामि" । वायस आह,-"अहं तावत् आकाशगतिः तत्कथं भवतो मया सह गमनम्” । स आह,-“यदि मे प्राणान् रक्षसि तदा स्वपृष्ठमा-