पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( २४२ ) पञ्चतन्त्रम् । अर्थेन बलवान्सर्वो अर्थयुक्तः स पण्डितः । पश्यैनं मूषकं व्यर्थं स्वजातेः समतां गतम् ॥ ९२ ॥ धनसे ही सब बलवान् हैं धनवान् ही पंडित हैं अब इस व्यर्थ पुरुषार्थ मूषेको अपनी जातिमें समान हुआ देखो ॥ ९२ ॥ तत् स्वपिहि त्वं गतशंकः । यदस्य उत्पतनकारणं तत् आवयोर्हस्तगतं जातम् । अथवा साधु चेदमुच्यते- सो तुम निश्शंक होकर शयन करो । जो इसके कूदनेका कारण था सो हमारे हाथमें प्राप्त हुआ है । अथवा यह अच्छा कहा है- दंष्ट्राविरहितः सर्पो मदहीनो यथा गजः । तथार्थेन विहीनोऽत्र पुरुषो नामधारकः ॥ ९३ ॥” डाहरहित सर्प मदहीन जैसे हाथी इस प्रकार धनके बिना पुरुष नाम- मात्रकाहै ॥ ९३ ॥” तत् श्रुत्वा अहं मनसा विचिन्तितवान् । “यतोऽङ्गु- लिमात्रमपि कूर्द्दनशक्तिर्नास्ति तत् धिक् अर्थहीनस्य पुरु- षस्य जीवितम् । उक्तञ्च- यह सुनकर मैं मनमें विचारने लगा “कि अब तो अंगुलिमात्र भी कूदनेकी शक्ति नहीं है सो अर्थहीन पुरुषके जीवनको धिकार है । कहाहै- अर्थेन च विहीनस्य पुरुषस्याल्पमेधसः । उच्छिद्यन्ते क्रियाः सर्वा ग्रीष्मे कुसरितो यथा ॥ ९४ ॥ अर्थसे हीन अल्पबुद्धिमान् पुरुषकी सब क्रिया ऐसे नष्ट होजाती हैं जैसे ग्रीष्ममें कुनदी ॥ ९४ ॥ यथा काकयवाः प्रोक्ता यथारण्यभवास्तिलाः । नाममात्रा न सिद्धौ हि धनहीनास्तथा नराः॥ ९५ ॥ जैसे काक यव और जैसे वनके तिल नाममात्र हैं उनसे कुछ सिद्धि नहीं इसी प्रकार धनहीन मनुष्य हैं ॥ ९५ ॥ सन्तोऽपि न हि राजन्ते दरिद्रस्येतरे गुणाः । आदित्य इव भूतानां श्रीर्गुणानां प्रकाशिनी ॥ ९६ ॥ दरिद्रके दूसरे गुण हों तो भी उनकी शोभा नहीं होती जैसे सूर्यसे पदा- र्थोंका प्रकाश होता है इसी प्रकार लक्ष्मी गुणोंका प्रकाश करती है ॥ ९६ ॥