भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । (११)

गमन न किया । तब उसको दुःखी देख साथियोंने कहा- "भो सेठ ! क्यो इस बैलके निमित्त सिंह व्याघ्रसे युक्त अनेक विपत्तिवाले इस वनमें सम्पूर्ण साथियोंको तुमने सन्देहमे नियुक्त किया है, कहाहै कि- न स्वल्पस्य कृते भूरि नाशयेन्मतिमान्नरः । एतदेवात्र पाण्डित्यं यत्स्वल्पाद्भूरिरक्षणम् ॥ १९ ॥” बुद्धिमान् थोडेके निमित्त बहुतका नाश न करै, यह पडिताई है कि, थोडेहिसे बहुतकी रक्षा करै ॥ १९ ॥” अथासौ तदवधार्य सञ्जीवकस्य रक्षापुरुषान् निरूप्य अशेषसार्थं नीत्वा प्रस्थितः । अथ रक्षापुरुषा अपि बह्वपायं तद्वनं विदित्वा सञ्जीवकं परित्यज्य पृष्ठतो गत्वा अन्येद्युस्तं सार्थवाहं मिथ्याहुः- "स्वामिन् । मृतोऽसौ सञ्जीवकोऽस्मा- भिस्तु सार्थवाहस्याभीष्ट इति मत्वा वह्निना संस्कृतः” इति तच्छ्रुत्वा सार्थवाहः कृतज्ञतया स्नेहार्द्रहृदयस्तस्य और्ध्व- देहिकक्रियाः वृषोत्सर्गादिकाः सर्वाश्चकार । सञ्जीवकोऽप्या- युःशेषतया यमुनासलिलमिश्रैः शिशिरतरवातैः आप्या- यितशरीरः कथञ्चिदप्युत्थाय यमुनातटमुपपेदे ॥ तत्र मरक- तसदृशानि बालतृणाग्राणि भक्षयन् कतिपयैरहोभिर्हरवृषभ इव पीनः ककुद्मान् बलवांश्च संवृत्तः प्रत्यहं वल्मीकशिखरा- ग्राणि शृङ्गाभ्यां विदारयन् गर्जमानः आस्ते । साधु चेदमु- च्यते- तब यह वैश्य इस बातको विचारकर, सञ्जीवकके निमित्त रक्षापुरुषोंको निरूपण कर और सब साथियोंको लेकर चला । तब रक्षक पुरुषभी अनेक कष्टयुक्त उस वनको देख सञ्जीवकको छोड उसके पीछे जाकर दूसरे दिन सार्थ- वाहसे मिथ्या कहने लगे- “हे स्वामिन् ! वह सञ्जीवक मरगया, हमने आप (सार्थ वाह ) का प्यारा जानकर अग्निसे सस्कार किया”। यह सुनकर सार्थवाह कृत- ज्ञता और प्रेमसे आर्द्रहृदय होकर उसकी और्ध्वदेहिक क्रिया वृषोत्सर्गादि सब करता भया । ( इधर ) सञ्जीवकभी आयु शेष रहनेके कारण यमुनाजलसे मिली अत्यन्त शीतल वायुद्वारा तृप्तशरीरसे किसी प्रकार उठकर यमुनाके किनारे प्राप्त

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