भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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(२६२) पञ्चतन्त्रम् । कारपरिवारयुतां दत्त्वा त्वं मे पुत्रोऽसीति नगरविदितं तं यौवराज्येऽभिषिक्तवान् । दण्डपाशेकेनापि स्वदुहिता स्वशक्त्या वस्त्रदानादिना सम्भाव्य प्राप्तव्यमर्थाय प्रदत्ता । अथ प्राप्तव्यमर्थेनापि स्वीयपितृमातरौ समस्तकुटुम्बावृतौ तस्मिन्नगरे सम्मानपुरःसरं समानीतौ । अथ सोऽपि स्वगो- त्रेण सह विविधभोगानुपभुञ्जानः सुखेन अवस्थितः। अतोऽहं- ब्रवीमि- यह विचारकर उसके पास न गया, उस समय वह ( प्राप्तव्यमर्थवाला ) घूमता हुआ श्वेत घरके निकट रात्रिमे लम्बायमान रस्सी ( कमन्द ) को देख- कर कौतुकयुक्त हृदयसे उसको पकडकर गया । उस राजपुत्रीने यह वहीहै इस प्रकार जान सन्तुष्टचित्तसे स्नान भोजन पानाच्छादनादिसे सन्मान किया उसके संग शय्यामें सोती हुई उसके अंगस्पर्शसे प्राप्त हुए हर्षसे रोमांचित शरीर हो उसने कहा-"तुम्हारे दर्शनमात्रसे अनुरक्त हुई मैंने अपना आत्मा तुमको दिया, तुमको छोडकर और स्वामी स्वप्नमेंभी मेरे न होगा, सो मेरे साथ आलाप क्यों नहीं करते" । वह बोला,-"मनुष्य प्राप्त होनेयोग्य अर्थकोही प्राप्त होताहै" । ऐसा कहनेपर यह और है ऐसा उसने विचार अपने धवलगृहसे उतारकर छोड- दिया, वह किसी टूटे देवमंदिरमें जाकर सो गया । तब वहां किसा कुलटाका संकेत किया हुआ जबतक नगररक्षक प्राप्त हुआ, उससे पहलेही यह सोगयाथा उसने देखकर इस गुप्तभेद छिपानेके लिये पूछा,-"आप कौनहै " । वह बोला "मनुष्य प्राप्त होने योग्यही अर्थको प्राप्त होताहै"। यह सुनकर वह दण्डपाशक बोला-"यह देवगृह शून्यहै । सो मेरे स्थानमें जाकर सोरह" । "बहुत अच्छा" ऐसा कह बुद्धिकी विपरीततासे अन्य स्थानमें सोगया, उस रक्षककी कन्या नियम- वती नामवाली रूपयौवनसे सम्पन्न किसी पुरुषमें अनुरक्त हुई संकेत देकर उस -स्थानमें सोगईथी तब यह उसको आया देख यही मेरा प्रियहै ऐसा रात्रीके घने अंधकारसे मोहित हुई उठकर भोजनाच्छादि क्रियाको कराकर गान्धर्वरीतिसे -अपना विवाहकर उसके संग शयनमें स्थित हुई खिले मुखकमलसे उससे बोली "अबभी क्यों निडर होकर तुम मुझसे नहीं बोलते"। वह बोला-"मनुष्य प्राप्त- -व्य अर्थको प्राप्त होताहै"। यह सुन उसने विचार किया, "जो बिना विचारे