पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (२५५) विद्वद्भिः सुहृदामत्र चिह्नैरेतैरसंशयम् । परीक्षाकरणं प्रोक्तं होमाग्नेरिव पण्डितैः ॥ १२० ॥ विद्वान् पंडितोंको इन चिन्होंसे अवश्यही होमाग्निकी समान सुहृदोंकी परीक्षा करनी कही है ॥ १२० ॥ तथाच- तैसेही- आपत्काले तु संप्राप्ते यन्मित्रं मित्रमेव तत् । वृद्धिकाले तु संप्राप्ते दुर्जनोऽपि सुहृद्भवेत् ॥ १२१ ॥ आपत्तिका समय प्राप्त होनेपर जो मित्र है वही मित्र है वृद्धिका समय प्राप्त होनेपर तो दुर्जन भी सुहृद् होजाता है ॥ १२१ ॥ तन्ममापि अद्य अस्य विषये विश्वासः समुत्पन्नो यतो नीतिविरुद्धा इयं मैत्री मांसाशिभिर्वायसैः सह जलचरा- णाम् । अथवा साधु इदमुच्यते- सो आज मेराभी इस विषयमें विश्वास हुआ है कि, नीतिविरुद्ध यह मित्रता मांस खानेवाले कौओंके साथ जलचरोंकी है। अथवा अच्छा कहा है- मित्रं कोऽपि न कस्यापि नितान्तं न च वैरकृत् । दृश्यते मित्रविध्वस्तात्कार्य्याद्वैरी परीक्षितः ॥ १२२ ॥ कोई किसीका न मित्रहै न अत्यन्त वैरी है मित्रके विपरीत कार्यकी परीक्षासे वैरी दीखता है ॥ १२२ ॥ तत् स्वागतं भवतः । स्वगृहवदास्यतामत्र सरस्तीरे । यच्च वित्तनाशो विदेशवासश्च ते सञ्जातस्तत्र विषये सन्तापो न कर्तव्यः । उक्तञ्च- सो आपका मङ्गलहो । अपने घरकी समान इस सरोवरके किनारे स्थित रहो और जो आपका धननाश और विदेशवास हुआ है इस विषयमे सन्ताप करना न चाहिये । कहा है- अभ्रच्छाया खलप्रीतिः सिद्धमन्नञ्च योषितः । किंचित्कालोपभोग्यानि यौवनानि धनानि च ॥ १२३ ॥ बादलोंकी छाया, दुष्टोंकी प्रीति, पकान्न, स्त्रिये, यौवन और धन यह किंचित्काल पर्यन्त भोग्य होते हैं ॥ १२३ ॥