पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (२६९)
सत्कृतो विहितभोजनाच्छादनसंमानः तस्य एव गृहे भव्य- शय्यामारुह्य सुष्वाप । ततश्च निशीथे यावत्पश्यति तावत् तौ एव द्वौ पुरुषौ मिथो मन्त्रयतः । अथ तयोः एक आह- “भोः कर्त्तः ! अनेन सोमिलकस्य उपकारं कुर्वता प्रभूतो व्ययः कृतः, तत् कथय कथमस्य उद्धारकविधिः भविष्यति । अनेन सर्वमेतद्व्यवहारकगृहात् समानीतम्” । स आह- “भोः कर्मन् मम कृत्यमेतत् । परिणतिः त्वदायत्ता” इति । अथ प्रभातसमये राजपुरुषो राजप्रसादजं वित्तम् आदाय समायात उपभुक्तधनाय समर्पयामास । तद् दृष्ट्वा सोमिलकः चिन्तयामास । “सञ्चयरहितोऽपि वरमेष उपभुक्तधनो न असौ गुप्तधनः । उक्तञ्च- पुरुष बोला- "जो ऐसा है तो फिर वर्द्धमान पुरको जा वहा दो वणिक्पुत्र रहते हैं एक गुप्तधन दूसरा उपभुक्तधन (धनका भोगनेवाला) है उन दोनोंका आशय देखकर पीछे वर मांगना, और जो केवल तेरा भी गुप्तधन (धनरक्षा) से प्रयोजन होगा तो तुझे भी गुप्तधन करदूगा । अथवा दत्तभोग्य धनसे तेरा प्रयोजन होगा तो वैसा करदूगा” । यह कहकर वह अन्तर्हित हुआ । सोमिलक आश्चर्ययुक्त होकर फिर वर्द्धमानपुरको गया, सन्ध्या समय थका हुआ किसी प्रकार उस पुरमें प्राप्त हो गुप्तधनके घरको पूछता हुआ कठिनतासे प्राप्त होकर सूर्यास्तमें प्रविष्ट हुआ तब यह भार्या पुत्रके सहित हुए गुप्तधनसे घुड- काया हुआ भी हठसे उसके घरमें प्रवेश कर बैठगया, तब भोजनके समय उसको भी भक्तिसे हीन कुछ भोजन दिया, तब यह भोजन कर जबतक सो कर आधी रातमे देखता है कि, वही दोनों पुरुष परस्पर मन्त्रणा करते हैं । तब एक बोला- "भो प्रभो क्यों तुमने इस गुप्तधनका अधिक व्यय किया, जो सोमिलकको इसने भोजन दिया, सो यह तुमने अयुक्त किया”। वह बोला- “भो कर्मन् इसमें मेरा दोष नहीं मुझे तो पुरुषको लाभ प्राप्ति देनी है । उसका परिणाम तुम्हारे आधीन है” । सो यह जबतक उठता है तबतक गुप्तधन विषूचिका (उवान्त) रोगसे खेदको प्राप्त हुआ रुग्णहै। क्षणमात्रको स्थित हुआ । सो दूसरे दिन उस दोषसे उसने लंघन किया । सोमिलक भी प्रभात