भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । ( २७७ ) प्रिय सुहृद् स्नेहके कारण घरके उद्यान (बगीचे) में गयेभी प्रियमें अनि- ष्टकी शंका करते हैं और बहुत आपत्तिवाले भययुक्त दारुण वनमें जानेसे तो क्या कहे ॥ १८१ ॥” अथ मन्थरको वायसमाह-“भो लघुपतनक ! अहं हिर- ण्यकश्च तावद् द्वौ अपि अशक्तौ तस्य अन्वेषणं कर्तुं मन्दग- तित्वात् । तद्गत्वा त्वं अरण्यं शोधय यदि कुत्रचित् तं जीवन्तं पश्यसि" इतितदाकर्ण्य लघुपतनको नातिदूरे याव- द्गच्छति तावत् पल्वलतीरे चित्राङ्गः कूटपाशनियन्त्रितः तिष्ठति । तं दृष्ट्वा शोकव्याकुलितमनाः तमवोचत्-“भद्र ! किमिदं ?” चित्राङ्गोऽपि वायसमवलोक्य विशेषेण दुःखित- मना बभूव । अथवा युक्तमेतत्- तब मन्थरक वायससे बोला,-"भो लघुपतनक ! मैं और हिरण्यक दोनोंही उसके ढूंढनेमें असमर्थ हैं कारण कि हम मन्दगति हैं। सो जाकर तू वनमें शोधन कर यदि कहीं उसको जीता देखे (उपायहो) तो"। यह सुनकर लघुपतनक थोड़ीही दूर गया तो छोटे सरोवरके किनारे चित्राङ्ग कपट जालसे बँधा मिला। उसे देख शोकसे व्याकुल मन होकर उससे बोला,-"भद्र ! यह क्या है?" चित्राङ्गभी वायसको देखकर बड़ा दुःखी हुआ। अथवा यह युक्तही है- अपि मन्दत्वमापन्नो नष्टो वापीष्टदर्शनात् । प्रायेण प्राणिनां भूयो दुःखावेगोऽधिको भवेत् ॥ १८२ ॥ लघुताके प्राप्त होनेपर वा नष्ट होनेमें अपने सुहृदोंके देखनेसे प्राणियोंको दुःखावेग अधिक होजाता है ॥ १८२ ॥ ततश्च वाक्यावसाने चित्रांगो लघुपतनकमाह-"भो मित्र ! सञ्जातोऽयं तावन्मम मृत्युः । तत् युक्तं सम्पन्नं यद् भवता सह मे दर्शनं सञ्जातम् । उक्तञ्च- उसके वचनके अन्तमें चित्राङ्ग लघुपतनकसे बोला-“भो ! मित्र यह मेरी मृत्यु उपस्थित हुई है सो अच्छाही हुआ जो आपका दर्शन मुझे हुआ। कहा है- प्राणात्यये समुत्पन्ने यदि स्यान्मित्रदर्शनम् । तद्द्वाभ्यां सुखदं पश्चाज्जीवतोऽपि मृतस्य च ॥ १८३ ॥