भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 317, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 317

( ३०२ ) पञ्चतन्त्रम् । न्तनं पितृसचिवं दीर्घायुषं सकलनीतिशास्त्रपारङ्गतं स्थिरजीविनामानं प्रणम्य प्रोवाच- "तात ! यत् एते मयाः पृष्टाः सचिवाः तावदत्र स्थितस्यापि तव परी- क्षार्थं, येन त्वं सकलं श्रुत्वा यदुचितं तन्मे समादिशसि। तत् यद्युक्तं भवति तत्समादेश्यम्” । स आह- "वत्स ! सर्वैरपि एतैर्नीतिशास्त्राश्रयमुक्तं सचिवैः । तदुपयुज्यते स्वकालोचितं सर्वमेव, परमेष द्वैधीभावस्य कालः। उक्तञ्च- सो संश्रयके बिना किसीका प्रतीकार नहीं होता। इस कारण संश्रय करना चाहिये ऐसा मेरा अभिप्राय है। यह चिरंजीवीका मंत्र है।" ऐसा कहनेपर वह मेघवर्ण राजा पुराने पिताके मंत्री दीर्घायुवाले सकल नीतिशास्त्रके पारगामी स्थिरजीविनामवालेको प्रणाम कर बोला,- "तात ! इतने मंत्रियोंसे जो आपके स्थितमें मैंने पूछा है, सो परीक्षाके निमित्त जिससे तुम सब सुनकर जो ... हो सो कहो जो युक्त हो सो तुम आज्ञादो" वह बोला- "वत्स! इन सबों मंत्रियोंने ही नीतिशास्त्रका आश्रय कहा है । सो अपने कालके अनुसार सबही उचित है। परन्तु यह द्वैधी ( १ ) भावका समय है । कहाहै- अविश्वासं सदा तिष्ठेत्सन्धिना विग्रहेण च । द्वैधीभावं समाश्रित्य नैव शत्रौ बलीयसि ॥ ६० ॥ संधि और विग्रहसे सदा अविश्वाससे स्थित रहे किन्तु प्रबल शत्रुमें द्वैधीभा- वको प्राप्त होकर अविश्वासमे स्थित नरहे (द्वैधीभावसे शत्रु ) जीते जाते हैं॥६०॥ तच्छत्रुं विश्वास्य अविश्वस्तैर्लोभं दर्शयद्भिः सुखेन उच्छि- द्यते रिपुः । उक्तञ्च- सो शत्रुको विश्वास देकर लोभके दिखानेवाले अविश्वासियोंसे शत्रु सुखसे उच्छेदको प्राप्तहोता है, कहाहै- उच्छेद्यमपि विद्वांसो वर्द्धयन्त्यरिमेकदा । गुडेन वर्द्धितः श्लेष्मा सुखं वृद्ध्या निपात्यते ॥ ६१ ॥ १ संदिग्धहोकर स्थित रहना ।