भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( ३३४ ) \quad पञ्चतन्त्रम् । आत्मस्वाम्यग्रे,तेन सह बहु वक्तव्यमस्ति”।अथ तैःनिवेदितः स उलूकराजो विस्मयाविष्टस्तत्क्षणात् तस्य सकाशं गत्वा प्रोवाच-“भो भोः ! किमेतां दशां गतस्त्वम् ? तत्कथ्यताम्”॥ स्थिरजीवी प्राह-“ देव ! श्रूयतां तदवस्थाकारणम् । अती- तदिने स दुरात्मा मेघवर्णो युष्मद्व्यापादितप्रभूतवायसानां पीडया युष्माकमुपरि कोपशोकग्रस्तो युद्धार्थं प्रचलित आसीत् । ततो मया अभिहितम्-“स्वामिन् ! न युक्तं भवत- स्तदुपरि गन्तुं बलवन्त एते, बलहीनाश्च वयम् । उक्तञ्च- सो आरंभ न करना अच्छा परन्तु आरंभ कर उसका विवाद करना अच्छा नहीं। सो मैं इनको शब्द सुना कर अपनेको दिखाऊं” ऐसा विचार कर मन्द मन्द शब्द करता हुआ। यह सुनकर वे सब उलूक उसके मारनेको आये। तब उसने कहा-“अहो ! मैं स्थिरजीवीनाम मेघवर्णका मंत्री हूं। मेघवर्णने मेरी यह दशा करदी। सो अपने स्वामीके आगे निवेदन करो। उससे बहुत कुछ कहना है”। तब उनसे कहा हुआ वह उलूकराज विस्मयको प्राप्त हो उसी समय उसके निकट जाकर बोला-“भो ! तू क्यों ऐसी दशाको प्राप्त हुआहै ? सो कहो”। स्थिरजीवी बोला-“देव ! इस अवस्थाका कारण सुनो। पिछले दिन वह दुरात्मा मेघवर्ण तुम्हारे मारे हुए बहुत वायसोंकी पीडासे तुमपर क्रोध शोकसे ग्रस्त होकर युद्ध करनेको चला। तब मैने कहा-“स्वामिन् ! तुमको उनपर चढाई करनी उचित नहीं यह बलीहै और हम बलहीनहैं। कहाहै- बलीयसा हीनबलो विरोधं न भूतिकामो मनसापि वाञ्छेत् । न बध्यतेऽत्यन्तबलो हि यस्मात् व्यक्तं प्रणाशोऽस्ति पतङ्गवृत्तेः ॥ १३१ ॥ ऐश्वर्यकी इच्छा करनेवाले हीनबल बलवान्‌के साथ मनसे भी विरोध नकरें कारणकि अत्यन्त बलवाला नष्टतो नहीं होता परंतु पतंगवृत्तिकी समान हीनब- लकाही प्रणाश होताहै ॥ १३१ ॥ तत् तस्य उपायनप्रदानेन सन्धिरेव युक्तः । उक्तञ्च- सो भेंट देकर उससे सन्धि करनाही युक्त है। कहाहै कि-