भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । ( ३४१ ) श्रूयते हि कपोतेन शत्रुः शरणमागतः । पूजितश्च यथान्यायं स्वैश्च मांसैर्निमन्त्रितः ॥ १३९ ॥" सुना है कि, कबूतरने शरणमें आये हुए शत्रुको यथायोग्य पूजन कर अपने मांससे निमंत्रित किया ॥ १३९ ॥" अरिमर्दनोऽब्रवीत्-“कथमेतत् ?” । क्रूराक्षः कथयति- अरिमर्दन बोला-“यह कैसे ?” क्रूराक्ष कहने लगा- कथा ७. कश्चित्क्षुद्रसमाचारः प्राणिनां कालसन्निभः । विचचार महारण्ये घोरः शकुनिलुब्धकः ॥ १४० ॥ कोई क्षुद्र आचारवाला प्राणियोंको कालकी समान घोर पक्षियोका लुब्धक वनमें विचरता था ॥ १४० ॥ नैव कश्चित्सुहृत्तस्य न सम्बन्धी न बान्धवः । स तैः सर्वैः परित्यक्तस्तेन रौद्रेण कर्मणा ॥ १४१ ॥ न कोई उसका सुहृत्, न सम्बन्धी, न बांधव था, उसके क्रूर कर्मसे सबने उसे त्याग दिया ॥ १४१ ॥ अथवा- अथवा- ये नृशंसा दुरात्मानः प्राणिनां प्राणनाशकाः । उद्वेजनीया भूतानां व्याला इव भवन्ति ते ॥ १४२ ॥ जो क्रूर दुरात्मा प्राणियोंके प्राण नाशक हैं वे भूतोंके उद्वेगकारक कालकी समान होते हैं ॥ १४२ ॥ स पञ्जरकमादाय पाशं च लगुडं तथा । नित्यमेव वनं याति सर्वप्राणिविहिंसकः ॥ १४३ ॥ वह सब प्राणियोंकी हिंसा करनेवाला पिंजरा पाश और लगुड लेकर नित्यही वनको जाता ॥ १४३ ॥ अन्येद्युर्भ्रमतस्तस्य वने कापि कपोतिका । जाता हस्तगता तां स प्राक्षिपत्पञ्जरान्तरे ॥ १४४ ॥