भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 36

भाषाटीकासमेतम् । ( २१ ) यमाश्रित्य न विश्रामं क्षुधार्त्ता यान्ति सेवकाः । सोऽर्कवन्नृपतिस्त्याज्यः सदा पुष्पफलोऽपि सन् ॥ ५२ ॥ जिसको प्राप्त होकर क्षुधासे व्याकुल सेवक विश्रामको प्राप्त नहीं होते हैं, वह सदा पुष्प फलयुक्तभी राजा आकके वृक्षकी समान त्यागने योग्य है ॥ ५२ ॥ राजमातरि देव्यां च कुमारे मुख्यमन्त्रिणि । पुरोहिते प्रतीहारे सदा वर्त्तेत राजवत् ॥ ५३ ॥ राजमाता, पटरानी, कुमार, मुख्यमन्त्री, पुरोहित और द्वारपाल इनसे राजाकी समान बर्ताव करै ॥ ५३ ॥ जीवेति प्रभु प्रोक्तः कृत्याकृत्यविचक्षणः । करोति निर्विकल्पं : स भवेद्राजवल्लभः ॥ ५४ ॥ कृत्य अकृत्यका जाननेवाला पुकारनेसे जिव ऐसा कहै और विना विचारे आज्ञा सम्पादन करे वह राजाका प्रिय होताहै ॥ ५४ ॥ प्रभुप्रसादजं वित्तं सुपाप्तं यो निवेदयेत् । वस्त्राद्यञ्च दधात्यङ्गे स भवेद्राजवल्लभः ॥ ५५ ॥ जो प्रभुकी प्रसन्नतासे प्राप्त हुए द्रव्यसे सन्तोष प्रकाश करे और उनके वस्त्र आदि अपने अंगमे धारण करे वह राजाका प्रिय होताहै ॥ ५५ ॥ अन्तःपुरचरैः सार्द्धं यो न मन्त्रं समाचरेत् । न कलत्रैर्नरेन्द्रस्य स भवेद्राजवल्लभः ॥ ५६ ॥ अन्तःपुरमें रहनेवालोंके साथ जो सलाह नहीं करता है, न राजाकी कल- त्रोंसे बात करताहै, वह राजप्रिय होताहै ॥ ५६ ॥ द्यूतं यो यमदूताभं हालां हालाहलोपमाम् । पश्येद्दारान्वृथाकारान्स भवेद्राजवल्लभः ॥ ५७ ॥ जुएको यमदूतकी समान, सुराको विषकी समान, स्त्रियोंको कुत्सित आकार- वाली देखता है, वह राजप्रिय होता है ॥ ५७ ॥ युद्धकालेऽग्रगो यः स्यात्सदा पृष्ठानुगः पुरे । प्रभोर्द्वाराश्रितो हर्म्ये स भवेद्राजवल्लभः ॥ ५८ ॥ जो युद्धकालमे आगे चले, पुरमे पीछे २ चले, महलमें प्रभुक द्वारे स्थित रहे वह राजाका प्रिय होता है ॥ ५८ ॥

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · पृष्ठ 36, कुल 536 में से · BharatKosha