पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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ऊपर शिर धरकर सो गया । उसके मुखसे सर्प फण निकालकर वायुभक्षण करता था । उसी बॉवईसे दूसरा सर्प निकल कर भी इसी प्रकार करता । तब उनके परस्पर दर्शनसे क्रोधसे लाल नेत्र कर वल्मीकमे स्थित सर्पने कहा- "भो भो दुरात्मन् ! किस प्रकार सर्वांगसुन्दर इस राजपुत्रको क्लेश देता है ?" मुखमें स्थित सर्प बोला,- "भो ! भो ! तुम दुरात्माने भी इस वल्मीकके मध्यमें किस प्रकार यह सुवर्णसे पूर्ण दो कलश दूषित किये हैं ?" इस प्रकार परस्पर दोनों भेद खोलते भये । फिर वल्मीकमे स्थित सर्प बोला,- "भो दुरात्मन् ! यह तेरी औषधी क्या कोई नहीं जानता है ? जो कि पुरानी आलोड़ित राजकां- जीके पानसे तू नाशको प्राप्त होगा" । तब वह मुखके भीतरका सर्प बोला- "क्या तेरी यह औषधी कोई नहीं जानता है ? जो गरम जल वा गरमतेलसे तेरा नाश होगा" । इस प्रकार वह राजकन्या वृक्षकी ओरसे उन दोनोंके पर- स्पर भेदके वचन सुनकर, वैसाही करती हुई अव्यंग और निरोग स्वामीको करके परम धनको प्राप्त हो अपने देशको चली । पिता माता सुजनोंसे पूजित हो यथेच्छ भोगोंको प्राप्त होकर सुखसे रही । इससे मैं कहता हू- परस्परस्य मर्माणि ये न रक्षन्ति जन्तवः । त एव निधनं यान्ति वल्मीकोदरसर्पवत् ॥ २०० ॥” जो प्राणी परस्परमर्मोकी रक्षा नहीं करते हैं वह वल्मीक और उदरके सर्पकी समान नष्ट होते हैं ॥ २०० ॥” तच्च श्रुत्वा स्वयमरिमर्दनोंऽपि एवं समर्थितवान् । तथाच अनुष्ठितं दृष्ट्वान्तर्लीनं विहस्य रक्ताक्षः पुनरब्रवीत्,- “कष्टम् ! विनाशितोऽयं भवद्भिः अन्यायेन स्वामी ! उक्तञ्च- यह सुनकर स्वयं अरिमर्दन भी इस बातको पुष्ट करता हुआ इस प्रकार ( शरणागत रक्षा ) के अनुष्ठानको देखकर अस्पष्ट स्वरसे हँसकर रक्ताक्ष फिर बोला, - "कष्ट है कि तुमने अन्यायसे स्वामीका नाश किया । कहा है- अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूज्यानान्तु विमानना । त्रीणि तत्र प्रवर्त्तन्ते दुर्भिक्षं मरणं भयम् ॥ २०१ ॥ जहा अपूज्य पूजे जाते हैं पूज्योंका निरादर होता है वहा तीन होते हैं दुर्भिक्ष, मरण और भय ॥ ३०१ ॥