पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ३६३ ) सो सर्वथा मूल उखडनेसेही हम नष्ट हुए । यह अच्छा कहा है- मित्ररूपा हि रिपवः सम्भाव्यन्ते विचक्षणैः । ये हितं वाक्यमुत्सृज्य विपरीतोपसेविनः ॥ २०७ ॥ जो मनुष्य हित वाक्य छोडकर विपरीत सेवन करते हैं चतुर पुरुषों द्वारा वे यथार्थमें बंधुरूपधारी शत्रु माने जाते हैं ॥ २०७ ॥ तथाच- और देखो- सन्तोऽप्यर्था विनश्यन्ति देशकालविरोधिनः । अप्राज्ञान्मन्त्रिणः प्राप्य तमः सूर्योदये यथा ॥२०८॥” देश कालके विरुद्ध आचरण करनेवालोंके प्रज्ञारहित मत्रियोंको प्राप्त होकर विद्यमान वस्तु भी ऐसे नष्ट होती हैं जैसे सूर्योदयमें अंधकार ॥२०८॥” ततः तद्वचोऽनादृत्य सर्वे ते स्थिरजीविनमुत्क्षिप्य स्वदुर्ग- मानेतुमारब्धाः । अथ आनीयमानः स्थिरजीवी आह- “देव ! अद्य अकिञ्चित्करेण एतदवस्थेन किं मया उपसंगृ- हीतेन यत्कारणमिच्छामि दीप्तं वह्निमनुवेष्टुं तत् अर्हसि मामग्निप्रदानेन समुद्धर्तुम्” । अथ रक्ताक्षः तस्य अन्तर्गत- भावं ज्ञात्वा अब्रवीत्- “किमर्थमग्निपतनमिच्छसि” । सोऽ- ब्रवीत्,- “अहं तावद् युष्मदर्थे इमामापदं मेघवर्णेन प्रापितः । तदिच्छामि तेषां वैरयातनाथमुलूकताम्” इति । तच्च श्रुत्वा राजनीतिकुशलो रक्ताक्षः प्राह- “भद्र ! कुटि- लस्त्वं कृतकवचनचतुरश्च । तत् त्वमुलूकयोनिगतोऽपि स्वकीयामेव वायसयोनिं बहुमन्यसे । श्रूयते च एतदा- ख्यानकम्- तब उसके वचनोंको अनादर करके सबही स्थिरजीवीको उठाकर अपने दुर्गमें लेजाने लगे । तब लेजाया हुआ स्थिरजीवी बोला-“देव ! अब कुछ भी करनेमें असमर्थ मेरे ग्रहण करनेसे क्या है । इस कारणसे अब मैं प्रदीप्त अग्निमें प्रवेशकी इच्छा करता हूं । सो मुझे अग्नि प्रदानसे उद्धार करनेको आप योग्य हो” । तब रक्ताक्ष उसके अन्तर्गत भावको जानकर बोला-“क्यों