भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( ३७६ ) पञ्चतन्त्रम् । तब सिंहके शब्द और उसकी प्रतिध्वनिसे वह गुहा पूर्ण होकर अन्य भी वनके स्थित जीवोको त्रास देती हुई। शृगाल भी यह श्लोक पढता भागा- अनागतं यः कुरुते स शोभते स शोच्यते यो न करोत्यनागतम्। वनेऽत्र संस्थस्य समागता जरा बिलस्य वाणी न कदापि मे श्रुता ॥ २२७ ॥" कि जो अनागत विपत्तिका उपाय करता है वह सुखी होता है जो अना- गतका विचारही नहीं करता वह कष्ट पाता है, इसी वनमें रहते मैं बूढा होगया परन्तु बिलकी वाणी मैंने कभी नहीं सुनी ॥ २२७ ॥” तदेवं मत्वा युष्माभिर्मया सह गन्तव्यम्"इति। एवमभि- धाय आत्मानुयायिपरिवारानुगतो दूरदेशान्तरं रक्ताक्षो जगाम । सो ऐसा विचार कर तुमको मेरे साथ चलना चाहिये" ऐसा कह अपने अनुगामी परिवारके साथ रक्ताक्ष दूर देशको चलगया । अथ रक्ताक्षे गते स्थिरजीवी अतिहृष्टमनाः व्यचिन्तयत, "अहो ! कल्याणमस्माकमुपस्थितं यत् रक्ताक्षो गतः। यतः स दीर्घदर्शी, एते च मूढमनसः ततो मम सुखघातयाः सञ्जा- ताः। उक्तञ्च यतः- रक्ताक्षके जानेपर स्थिरजीवी प्रसन्न हो विचारने लगा "अहो ! कल्याण उपस्थित हुआ है जो रक्ताक्ष गया । जो कि वह दीर्घदर्शी है और यह मूढ मनवाले हैं सो मेरे सुखसे घातके निमित्त हुए हैं। कहाहै कि- न दीर्घदर्शिनो यस्य मन्त्रिणः स्युर्महीपतेः । क्रमायाता ध्रुवं तस्य न चिरात्स्यात्परिक्षयः ॥ २२८ ॥ जिस राजाके यहां दीर्घदर्शी मंत्री नहीं होते हैं और वंशक्रमके नहीं हैं उसका शीघ्रही विनाश हो जाता है ॥ २२८ ॥ अथवा साधु इदमुच्यते- अथवा यह अच्छा कहा है-