भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( ३६४ ) पञ्चतन्त्रम् । दष्टः । तद अनेन दोषेण त्वं मण्डूकानां वाहनं भविष्यसि, तत्प्रसादलब्धजीविकया वर्त्तिष्यसे" इति । ततोऽहं युष्माकं वाहनार्थमागतोऽस्मि" । तेन च सर्वमण्डूकानामिदमावेदितं ततः तैः प्रहृष्टमनोभिः सर्वैरेव गत्वा जलपादनाम्नोद्दर्दुरा- जस्य विज्ञातम् । अथ असौ अपि मन्त्रिपरिवृतोऽत्यद्भुतमिद- मिति मन्यमानः ससम्भ्रमं ह्रदात् उत्तीर्य मन्दविषस्य फणिनः फणप्रदेशमधिरूढः। शेषा अपि यथाज्येष्ठं तत्पृष्ठोपरि समारुरुहुः । किं बहुना तदुपरि स्थानं प्राप्तवन्तः तस्य अनुपंदं धावन्ति । मन्दविषोऽपि तेषां तुष्ट्यर्थमनेकप्रकारान् गतिविशेषान् अदर्शयत् । अथ जलपादो लब्धतदङ्गसंस्पर्श- सुखः तमाह,- वरुण पर्वतके समीप एक स्थानमें वृद्ध मन्दविष नाम कृष्णसर्प था । वह इस प्रकार चित्तमे विचारने लगा कि “किस प्रकार मैं सुखके उपायसे जीवन निर्वाह करूं” । तब बहुतसे मेंडकवाले ह्रदके समीप प्राप्त होकर धैर्यशालीकी समान अपनेको दिखाता हुआ । तब उसके ऐसा स्थित होनेपर जलके समीप आये एक मेंडकने पूछा “मामा ! क्यों आज यथायोग्य पूर्वकी समान भोजनके निमित्त नहीं विचरते हो?” वह बोला-“भद्र ! मुझ मन्दभाग्यको भोजनकी अभि- लाषा कहां । कारण कि आज रात्रिमें प्रदोषके समय आहारके निमित्त विचरते हुए मैंने एक मण्डूक देखा । उसके पकडनेको मैंने उद्योग किया । वहभी मुझे देख मृत्युके भयसे वेदपाठमें रत ब्राह्मणोंके बीचमें गया हुआ मुझे विदित न हुआ, कि कहां गया । उस मण्डूककी सदृशतासे मोहित चित्तवाले मैंने किसी ब्राह्मणके पुत्रका ह्रदके किनारे जलान्तमें स्थित अंगूठा काट लिया तब वह शीघ्रही मर- गया । तब उसके पिताने दुःखी होकर मुझे शाप दिया। “दुरात्मन् ! तैने निरपराध मेरे पुत्रको काटा इस दोषसे तू मेंडकोंका वाहन होगा । उनके प्रसादसे प्राप्त हुई जीविकासे निर्वाह करेगा” ( इस प्रकार ) सो मैं तुम्हारे वाहनके निमित्त आयाहूं” । उसने यह बात सब मण्डूकोंसे कही । तब उन प्रसन्नमनवाले सबने जाकर जलपादनामवाले मेंडकराजसे कहा तब यह भी मंत्रियोंसे युक्त यह अतिचमत्कार हुआ ऐसा मानता हुआ । सम्भ्रम ह्रदसे निकलकर मन्दविष