भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

DevanagariHindipublished536 पृष्ठ

पृष्ठ 404, कुल 536 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 404

भाषाटीकासमेतम् । ( ३८९ ) तब मन्दविष सर्पने मनमें हँसकर "मेढकोंमें अनेक प्रकारका स्वाद है" ऐसा उससे कहा । तब जलपाद अत्यन्त दुःखी हृदय होकर "इसने क्या कहा" ऐसा उससे पूछता हुआ- "भद्र ! क्या तुमने यह विरुद्ध वचन कहा" तब यह आकारछिपानेके निमित्त "कुछ भी नहीं" ऐसे बोला । इसीप्रकार बनावटी वचनोंसे मोहितचित्त जलपाद उसके दुष्टअभिप्रायको न जानता हुआ । बहुत कहनेसे क्या उसने इसप्रकार वे सब भक्षण किये जो बीजमात्रभी न बचा इससे मैं कहता हू- "स्कन्धेनापि वहेच्छत्रुं कालमासाद्य बुद्धिमान् । महता कृष्णसर्पेण मण्डूका बहवो हताः ॥ २५१ ॥" "समयको प्राप्त हो बुद्धिमान् शत्रुओंको कन्धेपर चढावे जैसे बडे काले सापने (शिरपर चढाय) बहुतसे मेढक मारे ॥ २५१ ॥" अथ राजन् ! यथा मन्दविषेण बुद्धिवलेन मण्डूका निह- ताः तथा मयापि सर्वेऽपि वैरिण इति । साधु चेदमुच्यते- भो राजन् जैसे मन्दविषने बुद्धिके बलसे मेढक मारे इसीप्रकार मैंने भी सब वैरी (मारे) । यह अच्छा कहा है कि- "वने प्रज्वलितो वह्निर्दहन्मूलानि रक्षति । समूलोन्मूलन कुर्याद्वायुर्यो मृदुशीतलः ॥ २५२ ॥" 'वनमे प्रज्वलित अग्नि जलाती हुईभी मूलोंकी रक्षा करतीहै परन्तु जो मृदु और शीतल वायुहै वह जडसेही (वृक्षादि) का उन्मूलन करदेतीहै ॥२५२॥" मेघवर्ण आह-"तात ! सत्यमेवैतत् । ये महात्मानो भवन्ति ते महासत्त्वा आपद्गता अपि प्रारब्धं न त्यजन्ति । उक्तञ्च यतः- मेघवर्ण बोला,- "तात ! यह सत्यहै जो महात्मा होतेहैं वे महाबली आपत्तिको प्राप्त होकरभी प्रारब्धको नहीं छोडतेहै । कहा है कि- महत्त्वमेतन्महतां नयालङ्कारधारिणाम् । न मुञ्चन्ति यदारब्धं कृच्छ्रेऽपि व्यसनोदये ॥ २५३ ॥ नीतिका भूषण धारणकरनेवाले महात्माओंका यही महत्त्वहे जो अतिकष्ट- की विपतमें भी आरम्भको नहीं त्यागते हैं ॥ २५३ ॥

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · पृष्ठ 404, कुल 536 में से · BharatKosha