भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । ( ४१६ ) “भूखा क्या पाप नहीं करता है, क्षीण मनुष्य दयारहित होजाते हैं भद्रे प्रियदर्शनसे कहना मैं फिर कूपमें नहीं आऊगा ॥३२॥” एवमुक्त्वा स तां विसर्जयामास । यह कह उसने उसको विदा करादिया । तत् भो दुष्ट जलचर ! अहमपि गंगदत्त इव त्वद्गृहे न कदाञ्चित् अपि यास्यामि” । तत् श्रुत्वा मकर आह-“भो मित्र ! न एतद् युज्यते । सर्वथा एव मे कृतघ्नतादोषं अप- नय मद्गृहागमनेन । अथवा अत्र अहं अनशनात् प्राणत्यागं तव उपरि करिष्यामि” । वानर आह-“मूढ ! किं अहं लम्बकर्णो मूर्खो दृष्टापायोऽपि स्वयमेव तत्र गत्वा आत्मानं व्यापादयामि । सो हे दुष्ट जलचर ! मैंभी तेरे घर गंगदत्तकी समान किसी प्रकार नहीं जाऊंगा” । यह सुनकर मकर बोला-“भो मित्र ! सर्वथा तुमको यह युक्त नहीं है मेरे कृतघ्नता दोषको मेरे घर चल कर दूरकरो । अथवा मैं यहा लंघनकर तुम्हारे ऊपर प्राण त्यागन करूंगा” वानर बोला-“मूर्ख ! क्या मैं लम्बकर्ण मूर्ख हू जो अपाय ( आपत्ति ) देखकर भी स्वय वहा जाकर अपनेको नष्ट करू ' आगतश्च गतश्चैव दृष्ट्वा सिंहपराक्रमम् । अकर्णहृदयो मूर्खो यो गत्वा पुनरागतः ॥ ३३ ॥” जो आकर सिंहके पराक्रमको देखकर भाग गया और कर्णहृदयरहित होनेके कारण वह मूर्ख फिरभी आगया ॥ ३३ ॥” मकर आह,-“भद्र ! स को लम्बकर्णः ? कथं दृष्टापायो- ऽपि मृतः ? तत् मे निवेद्यताम्” ! वानर आह- मकर बोला,-“भद्र वह लम्बकर्ण कौनहै ? किस प्रकार आपत्ति देखकर भी वहा जाकर मृत हुआ २ । सो मुझसे कहो” । वानर बोला- कथा ३. कस्मिंश्चित् वनोद्देशे करालकेशरो नाम सिंहः प्रति- वसति स्म । तस्य च धूसरको नाम शृगालः सदा एव अनु-