पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
पृष्ठ 436, कुल 536 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ४२१ ) आसीत् येन इह आगत्य त्वामवलोक्य भूयोऽपि आगतः” । अथ तद्वचनं श्रद्धेयं मत्वा सिंहः तेनैव सह संविभज्य निःश- ङ्कितमनाः तं भक्षितवान् । अतोऽहं ब्रवीमि- इसी समय तयार बैठे सिंहने लम्बकर्णको मारडाला तब उसे मार उसकी रक्षामें शृगालको निरूपण करके स्वय स्नान करनेके निमित्त नदीको गया । शृगा- लनेभी चपलता को और उत्कंठासे उसका कान और हृदय भक्षण किया, इसी समय सिंहभी जबतक स्नान कर देवतार्चन करके पितृगणोंको तृप्त करके आया तबतक कर्णहृदयसे रहित गर्दभको देखा । उसे देख क्रोधसे सिंह शृगालसे बोला-“पापिष्ठ ! क्या यह तैने अनुचित कर्म किया जो कर्ण हृदयको भक्षण- कर यह जूठा कर दिया” । शृगाल विनयपूर्वक बोला-“स्वामिन् ऐसा मत कहो ! यह गधा कर्ण और हृदयसे रहितही था, जिससे यहा आकरभी तुम्हें देखकर फिरभी आया” । तब उसके वचनको सिंहने श्रद्धासे मानकर उसको विभाग कर उसके साथ निःशक होकर भक्षण किया । इससे मैं कहता हू-- “आगतश्च गतश्चैव दृष्ट्वा सिंहपराक्रमम् । अकर्णहृदयो मूर्खो यो गत्वा पुनरागतः ॥ ३८ ॥” “जो आकर और सिंहके पराक्रमको देखकर चला गया । परन्तु कर्ण और हृदय रहित होनेके कारण वह मूर्ख फिर आया ॥ ३८ ॥” तन्मूर्ख ! कपटं कृतं त्वया । परं युधिष्ठिरेणेव सत्यवच- नेन विनाशितम् । अथवा साधु इदमुच्यते- सो मूर्ख ! तैने कपट किया परन्तु युधिष्ठिरकी समान सत्य वचनसे नष्ट कर दिया । अथवा यह अच्छा कहा है- “स्वार्थमुत्सृज्य यो दम्भी सत्यं ब्रूते सुमन्दधीः । स स्वार्थाद् भ्रश्यते नूनं युधिष्ठिर इवापरः ॥ ३९ ॥” “जो मूढमति पाखण्डी मनुष्य स्वार्थको छोडकर सत्य कहता है वह युधिष्ठि- रकी समान अवश्य स्वार्थसे भ्रष्ट होता है ॥ ३९ ॥” मकर आह-“कथमेतत् ?” स आह- मकर बोला-“यह कैसी कथा है ?” वह बोला--