भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( ४२६ ) पञ्चतन्त्रम् । एकभी धैर्यवान् उत्साहवालेके रणमें स्थित होनेसे सेना उत्साहवाली होती है और भय होनेसे भङ्ग होजाती है ॥ ४३ ॥ तथाच- और देखो- अत एव हि वाञ्छन्ति भूपा योधाम्महाबलान् । शूराम्वीरान्कृतोत्साहान्वर्जयन्ति च कातरान् ॥ ४४ ॥” इसी कारण राजा महाबली योद्धाओंकी इच्छा करते हैं शूर, वीर, उत्साह- संपन्नका संग्रह करना । कायरोका नहीं ॥ ४४ ॥” अथ तौ द्वौ अपि गृहं प्राप्य पित्रोरग्रतो विहसन्तौ ज्येष्ठ- भ्रातृचेष्टितमूचतुः। “यथा गजं दृष्ट्वा दूरतोऽपि नष्टः” । सोऽपि तदाकर्ण्य कोपाविष्टमनाः प्रस्फुरिताधरपल्लवः ताम्रलोचनः त्रिशिखां भृकुटिं कृत्वा तौ निर्भर्त्सयन् परुषतरवचनानि उवाच । ततः सिंह्या एकान्ते नीत्वा प्रबोधितोऽसौ-“वत्स ! मैवं कदाचित् जल्प । भवदीयलघुभ्रातरौ एतौ” । अथ असौ प्रभूतकोपाविष्टः तामुवाच-“किमहं एताभ्यां शौर्येण रूपेण विद्याभ्यासेन कौशलेन वा हीनः । येन मां उपहसतः । तन्मया अवश्यं एतौ व्यापादनीयौ” । तदाकर्ण्य सिंही तस्य जीवितमिच्छन्ती अन्तर्विहस्य प्राह- तब वे दोनोंही घरको प्राप्त होकर माता पिताके आगे हँसकर बडे भाईकी चेष्टाको कहते हुए । “जैसे वह हाथीको देख दूरसेही भाग गया”। वहभी यह सुन क्रोधाविष्ट मनसे होठरूपी पल्लव फडकाता लाल नेत्र तीन शिखावाली भृकुटी- को कर उन दोनोको घुडकता हुआ अधिक कठोर वचन बोला । तब सिंहीने एकान्तमें लेजाकर उसे समझाया । “पुत्र ! ऐसा कभी न कहना । यह दोनो तेरे छोटे भ्राता हैं”। तब यह अत्यन्त क्रोधितहो उस ( सिंही ) से बोला, “क्या मैं इनसे शूरता, रूप, विद्या अभ्यास, चतुराईमें कम हूं ? जिससे मेरा हास्य करते हैं इससे अवश्यही मैं इन, दोनोंको मार डालूंगा” । यह सुन सिंही उसके जीनेकी इच्छा करती मनमें हँसकर बोली-