पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । (४३१)
अर्दित हो ब्राह्मणी उसके पास जाकर बोली,—"भद्र ! यदि मेरी इच्छा नहीं करो तो मुझ आसक्तकी स्त्रीहत्या तुमको लगेगी"। लगडा बोला—"व्याधीसे ग्रस्त मुझसे तू क्या करेगी ?” वह बोली इस कहनेसे क्या है । अवश्य तेरे संगमे संगम करूंगी"। यह सुनकर उसने वैसाही किया, सुरतके अंतमें वह बोली— "अबसे लेकर जीवन पर्यन्त अपना आत्मा मैंने तुम्हें दिया। ऐसा जानकर तुमभी हमारे साथ आओ"। वह बोला—"ऐसाही हो" तब ब्राह्मण भोजन लिये आकर उसके साथ खाने लगा। वह बोली—"यह लगडा भूखा है सो इसकोभी कुछ ग्रास प्रदान करो"। वैसा करनेपर फिर ब्राह्मणीने कहा—"हे ब्राह्मण! तुम सहायहीन होकर ग्रामान्तरको जाते हो। सो मेरा कोई बचनसहायक भी नहीं सो इस पंगुको लेचलें?" वह बोला—"मैं स्वयं अपनेसे अपने लेजानेको तौ समर्थ हूही नहीं। फिर इस पंगुको कैसे लेचलूगा ?” वह बोली—"गठरीके भीतर कर इसको मैं ले जाऊ- गी"। तब उसके बनावटी वचनोंसे मोहित चित्त होकर उसने वह सब अंगी- कार किया । वैसा करनेपर एक दिन कूपके समीप विश्राम करते हुए ब्राह्मणको उस पंगुमें आसक्त चित्तवाली स्त्रीने कूपमें गिरा दिया । वहभी पंगुको ग्रहण कर किसी नगरमें प्रविष्ट हुई। वहा करके चुराजानेकी खोज रक्षाके निमित्त इधर उधर घूमते हुए राजपुरुषोंने उसके मस्तकपर वह गठरी देखी । और बलसे छीनकर राजाके आगे लेगये। राजानेभी जब उसे खोला तौ उसमें लंगडेको देखा । तब वह ब्राह्मणी विलाप करती हुई राजपुरुषोंके पीछे २ वहा आई राजाने पूछा—"तेरा क्या वृत्तान्त है” वह बोली—"मेरा यह स्वामी रोग- ग्रस्त गोतियोंसे उद्वेजित हुआ है मैंने स्नेहसे व्याकुल मनसे शिरपर धारण कर आपके नगरमें प्राप्त किया है"। यह सुनकर राजा बोला—"ब्राह्मणि ! तू मेरी बहन दो ग्राम ग्रहण कर भर्ताके संग भोगोंको भोगती सुखसे रह" । उधर वह ब्राह्मण दैववशसे किसी साधुद्वारा कुएंसे निकाला हुआ, घूमता हुआ उसी नगरमें आया । और दुष्ट उस भार्याने देखकर राजासे कहा—"राजन् ! यह मेरे स्वामीका वैरी आया है" । राजाने उसके वधकी आज्ञा दी । वह बोला—"देव! इसने मेरा सक्त ( सक्रान्त वस्तु ) कुछ ग्रहण कर लिया है । जो तुम धर्मवत्सल हो तो दिलादो" । राजा बोला—"भद्रे ! जो तुमने इसका सक्त ( सक्रान्त ) कुछ लिया हो तो देना"। वह बोली—"देव! मैंने कुछ ग्रहण नहीं किया"। ब्राह्मण