भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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( ३० ) पञ्चतन्त्रम् । न गर्वं कुरुते माने नापमाने च तप्यते । स्वाकारं रक्षयेद्यस्तु स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९८ ॥ जो सन्मानमें गर्व नहीं करता, अपमानमें तापित नहीं होता है और जो अपने मानापमानके भावको रक्षित करता है वह राजाका भृत्य होनेके योग्यहै ९८ न क्षुधा पीड्यते यस्तु निद्रया न कदाचन । न च शीतातपाद्यैश्च स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ ९९ ॥ कभीभी जो निद्रा और क्षुधा शीत आदिसे पीडित नहीं होता है वह राजा- ओंके भृत्य होनेके योग्य है ॥ ९९ ॥ श्रुत्वा सांग्रामिकीं वार्त्तां भविष्यां स्वामिनं प्रति । प्रसन्नास्यो भवेद्यस्तु स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ १०० ॥ जो आगे होनेवाली स्वामीकी संग्राम वार्ताको सुनकर प्रसन्नमुख होता है वह राजाके भृत्य होनेके योग्य है ॥ १०० ॥ सीमावृद्धिं समायाति शुक्लपक्ष इवोडुराट् । नियोगसंस्थिते यस्मिन् स भृत्योऽर्हो महीभुजाम् ॥ १०१ ॥ जिस भृत्यके नियुक्त होनेमें शुक्ल पक्षके चन्द्रमाकी समान राजाकी सीमा वृद्धिको प्राप्त होती हे वही राजाओंका भृत्य होनेके योग्य है ॥ १०१ ॥ सीमा सङ्कोचमायाति वह्नौ चर्म इवाहितम् । स्थिते यस्मिन्स तु त्याज्यो भृत्यो राज्यं समीहता ॥ १०२ ॥ और जिसकी स्थितिमें अग्निमें चर्मकी समान सीमा संकोच भावको प्राप्त होतीहै राज्यकी इच्छा करनेवाले राजा उस भृत्यको त्यागने करे ॥ १०२ ॥ तथा शृगालोऽयमिति मन्यमानेन ममोपरि स्वामिना यदि अवज्ञा क्रियते तदपि अयुक्तम् । उक्तं च यतः- और यह शृगाल है यदि ऐसा मानकर स्वामी मेरी अवज्ञा करें तो यहभी अनुचित है । कारण कहा भी है- कौशेयं कृमिजं सुवर्णमुपलाहूवाप गोरोमतः पङ्कात्तामरसं शशाङ्क उदधेरिन्दीवरं गोमयात् । काष्ठादग्निरहेः फणादपि मणिर्गोपित्ततो रोचना प्राकाश्यं स्वगुणोदयेन गुणिनो गच्छन्ति किं जन्मना १०३