पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ४३५ ) नस्थानमपि नीयते । अथ अन्यस्मिन् अहनि स मदोद्धतो दूरात रासभीशब्दमशृणोत् । ततश्रवणमात्रेण एव स्वयं शब्दयितुमारब्धः । अथ ते क्षेत्रपाला रासभोऽयं व्याघ्रचर्म- प्रतिच्छन्न इति ज्ञात्वा लगुडशरपाषाणप्रहारैः तं व्यापादित- वन्तः । अतोऽहं ब्रवीमि- किसी एक स्थानमें शुद्धपट नाम धोबी रहता था । उसका एक गधा था वह घासके विना अतिदुर्बलताको प्राप्त हुआ । तब उस धोबीने वनमें घूमते हुए एक मरा व्याघ्र देखा विचारामी, “अहो ! बहुत अच्छा हुआ । इस व्याघ्र (चीते) के चमड़ेसे ढककर रात्रिमें गधेको जौके क्षेत्रमें छोड़ दूंगा । जिससे इसको व्याघ्र मानकर समीपवर्ती क्षेत्रपाल इसको न निकालेंगे”। ऐसा करनेपर गधा यथेच्छ धान्य खेत भक्षण करने लगा सवेरे धोबी उसे अपने स्थानमें लाता। इस प्रकार समय बीतनेपर गधा पुष्ट शरीर होगया । कठिनतासे बंधन स्थानमें ले जाया जाता । तब और दिन उस मदोद्धतने दूरसे गधैयाका शब्द सुना उसके सुनतेही वह स्वयं शब्द करने लगा । तब वे क्षेत्रपाल यह तो गधा है व्याघ्रचर्मसे ढका है ऐसा जानकर लठिया बाण तथा पत्थरके प्रहारोंसे उसे मारते हुए । इससे मैं कहता हूं- सुगुप्तं रक्ष्यमाणोऽपि दर्शयन्दारुणं वपुः । व्याघ्रचर्मप्रतिच्छन्नो वाक्कृते रासभो हतः ॥ ५२ ॥” अच्छी प्रकार रक्षा होकर भी अपना दारुण शरीर दिखाता हुआ व्याघ्रचर्मसे प्रच्छन्न हुआ गधा वाणीके दोषसे मारा गया ॥ ५२ ॥” अथ एवं तेन सह वदतो मकरस्य जलचरेण एकेन आगत्य अभिहितं-“भो मकर ! त्वदीया भार्या अनशनो- पविष्टा त्वयि चिरयति प्रणयाभिभवाद्दिपन्ना”। एवं तद्वज्र- पातसदृशवचनमाकर्ण्य अतीव व्याकुलितहृदयः प्रलपितमेवं चकार । “अहो ! किमिदं सञ्जातं मे मन्दभाग्यस्य । उक्तञ्च- तब ऐसे उसके साथ कहते मकरके एक जलचरने आकर उससे कहा-“भो मकर ! तुम्हारी स्त्री अनशन व्रतमें बैठी हुई तुम्हारे चिरकालतक न आनेसे प्रेमकी अवमाननाके कारण मर गई”। इस प्रकार उसके वज्रपातकी समान