भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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[Header] भाषाटीकासमेतम् । (४४९)

अपवाहितः। तत् कथमिदानीम् एनमपवाहयिष्यामि। नूनं शूरोऽयम्, न खलु भेदं विना साध्यो भविष्यति। उक्तञ्च यतः- तब सिंहके जानेपर कोई चीता वहा आया। उसको भी देखकर यह विचारने लगा। "एक दुरात्माको तो प्रणामकर भगाया। सो अब किस प्रकार इसको यहासे दूर करू। निश्चयही यह शूर है भेदके विना साध्य नहीं होगा। जिस कारण कहा है कि- न यत्र शक्यते कर्तुं साम दानमथापि वा। भेदस्तत्र प्रयोक्तव्यो यतः स वशकारकः ॥ ७६ ॥ जहा साम, दान करनेको यह प्राणी समर्थ न हो वहा भेदका प्रयोग करे कारण कि यही वशमें करनेवाला है ॥ ७६ ॥ किञ्च, सर्वगुणसम्पन्नोऽपि भेदेन बध्यते। उक्तञ्च यतः- क्यों कि सर्व गुणसम्पन्न भी भेदसे बधता है। कहा है कि- अन्तःस्थेन विरुद्धेन सुवृत्तेनातिचारुणा। अन्तर्भिन्नेन सम्प्राप्तं मौक्तिकेनापि बन्धनम् ॥ ७७ ॥ अन्तरमें स्थित विरुद्ध सुडोल होनेसे मनोहर भीतरसे भिन्न होनेके कारण मोती भी बन्धनको प्राप्त होता है। अथवा अन्तर्गत (दुर्गमें स्थित) सुचरित्र, लोक रंजन करनेवाले आचरणसे युक्त अभ्यन्तरसे भिन्न प्रजासे उपजापको प्राप्त हुए औरों करके आत्मा बधनको प्राप्त किया जाता है ॥ ७७ ॥ एवं सम्प्रधार्य तस्याभिमुखो भूत्वा गर्वात् उन्नतकन्धरः ससम्भ्रमम् उवाच,-"माम ! कथं अत्र भवान् मृत्युमुखे प्रविष्टः येन एष गजः सिंहेन व्यापादितः। स च माम् एतद्र- क्षणे नियुज्य नद्यां स्नानार्थं गतः। तेन च गच्छता मम समादिष्टं,-"यदि कश्चिदिह व्याघ्रः समायाति, तत् त्वया सुगुप्तं मम आवेदनीयम्। येन वनमिदं मया निर्व्याघ्रं कर्तव्यम्। यतः पूर्वं व्याघ्रेण एकेन मया व्यापादितो गजः शून्ये भक्षयित्वा उच्छिष्टतां नीतः। तद्दिनात् आरभ्य २९