भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । ( ४५९ ) घरमे जाकर विचारने लगा,- "अवश्यही यह सब बौद्ध सन्यासी शिरमे डण्डेसे प्रहार करनेसे सोनेके होजाते हैं सो मैंभी बहुतोंको बुलाकर डण्डोंसे शिरमें प्रहार करके मारू । जिससे मेरे यहा बहुत धन होजाय" । ऐसा विचार कर बडे कष्टसे उसने रात बिताई प्रात.कालही उठकर एक बडे डण्डेको तयारकर संन्यासियोंके विहारस्थलमें जाकर जिनेन्द्रकी तीन प्रदक्षिणा करके जंघाके बलसे पृथ्वीमें बैठकर वक्रद्वार ( मुख ) में दुपट्टा लपेटे हुए ऊंचे स्वरसे इस श्लोकको पढने लगा- जयन्ति ते जिना येषां केवलज्ञानशालिनाम् । आजन्मनः स्मरोत्पत्तौ मानसेनोषरायितम् ॥ १२ ॥ केवल निरवच्छिन्न ज्ञानवाले जिनके चित्तमें जन्मसेही कामोत्पत्ति उषरवत् रही है (नहीं हुई) वे क्षपणक सबसे उत्कृष्ट वर्तते हैं ॥ १२ ॥ अन्यच्च- औरभी- सा जिह्वा या जिनं स्तौति तच्चित्तं यज्जिने रतम् । तावेव च करौ श्लाघ्यौ यौ तत्पूजाकरौ करौ ॥ १३ ॥ वही जिह्वा है जो जिनकी स्तुति करती है, वही चित्त है जो जिनमें रत है, वही श्लाघनीय हाथ हैं जो बौद्धकी पूजा करनेवाले हैं ॥ १३ ॥ तथा च- और देखो- ध्यानव्याजमुपेत्य चिन्तयसि कामुन्मील्य चक्षुः क्षणं पश्यानंगशरातुरञ्जनमिमं त्रातापि नो रक्षसि । मिथ्याकारुणिकोऽसि निर्घृणतरस्त्वत्तः कुतोऽन्यः पुमान् सेर्ष्यं मारवधूभिरित्यभिहितो बौद्धो जिनः पातु वः॥१४॥ हे माननीय ! ध्यानके बहानेसे किस कान्ताका स्मरण करता है, आख खोल- कर कामबाणसे विद्ध इस जनको अवलोकन कर । त्राणमें समर्थ होकरभी हमारी रक्षा क्यो नहीं करता ? । इस कारण तुम अलीक दयावाले हो, तुमसे अधिक और निर्दयी पुरुष कौन होगा, ईर्ष्यापूर्वक कामदेवकी वधूसे इस प्रकार कहेहुए बौद्ध जिन तुम्हारी रक्षा करै ॥ १४ ॥