भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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[Header] भाषार्टीकासमेतम् । ( ४६५ )

प्रकाश करनेके निमित्त माताके सम्मुख गया । माताभी रुधिरसे गीला उसका मुख देखकर शंकितचित्तसे “कि, इस दुरात्माने मेरा बालक खाया है” ऐसा विचार कर क्रोधसे उसके ऊपर वह जलका घडा फेंका । इस प्रकार वह नौले- को मारकर जबतक विलाप करती घरमें आई तबतक बालक सो रहा था । निकटही काले सर्पको टुकडे हुआ देखकर पुत्रवधके शोकसे अपना शिर वृक्षकी जडमें मारने लगी । इसी समय ब्राह्मण भिक्षा लेकर आय देखने लगा कि, पुत्रशोकसे ब्राह्मणी विलाप कर रही है । “भो ! भो ! लोभी ! लोभके कारण तैने मेरा वचन न किया । सो अब पुत्रकी मृत्युके दुखेरूपी वृक्षका फल भोग । अथवा अच्छा कहा है- अतिलोभो न कर्त्तव्यो लोभं नैव परित्यजेत् । अतिलोभाभिभूतस्य चक्रं भ्रमति मस्तके ॥ २२ ॥” अति लोभ नहीं करना चाहिये और सर्वथा लोभ त्यागन भी न करे, अति लोभी मनुष्यके मस्तकपर चक्र घूमता है ॥ २२ ॥” ब्राह्मण आह,-“कथमेतत् ?” सा प्राह,- ब्राह्मण बोला-“यह कैसे ?” वह बोली-- कथा ३- कस्मिंश्चित् अधिष्ठाने चत्वारो ब्राह्मणपुत्राः परस्परं मित्र- तां गता वसन्ति स्म, ते चापि दारिद्र्योपहताः परस्परं मन्त्रं चक्रुः “अहो ! धिक् इयं दारिद्रता । उक्तञ्च- किसी स्थानमें चार ब्राह्मणके पुत्र परस्पर मित्र रहते थे वे दारिद्रताको प्राप्त हो परस्पर विचार करने लगे । “अहो ! इस दारिद्रताको धिक्कार है । कहा है- वरं वनं व्याघ्रगजादिसेवितं जनेन हीनं बहुकण्टकावृतम् । तृणानि शय्या परिधानवल्कलं न बन्धुमध्ये धनहीनजीवितम् ॥ २३ ॥ सिंह हाथियोंसे सेवित मनुष्योंसे हीन बहुत कांटोंसे युक्त वन बहुत अच्छा है, तृणकी शय्या और वल्कल वस्त्र उत्तम है, परन्तु बंधुओंके बीचमें धनहीन होकर जीना भला नहीं ॥ २३ ॥ ३०