पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ४७५ ) सो यहभी चले” । ऐसा करनेपर उन बटोहीयोंने जङ्गलमे मरे सिंहकी हड्डी देखी । तब एकने कहा-“अहो ! आज विद्याकी परीक्षा करे । कोई यह जीव मृतक हुआ स्थित है । सो विद्याके प्रभावसे इसको जीवित करें । मैं अस्थिस- चय करूं” । तब एकने उत्कठासे अस्थिसंचय की । दूसरेनें ( मन्त्रसे ) चर्म मास रुधिरसे युक्त किया । तीसराभी जबतक उसको जीवित करने लगा । तबतक सुबुद्धिने निषेध किया-‘भो ! आप ठहरो । यह सिंह निर्मित किया जाता है । जो इसे जीवित करोगे तो यह सबको नष्टकर देगा” । इस प्रकार उसके कहनेपर वह बोला,-‘धिक् मूर्ख ! मैं विद्याको विफल नहीं करूंगा” । तब उसने कहा-“तो क्षणमात्र प्रतीक्षा करो जबतक मैं वृक्षपर चढ जाऊं” । ऐसा करनेपर जभी उन्होंने उसे जिलाया तबतक उन तीनोंको उठकर सिंहने मारडाला । और वह फिर वृक्षसे उतरकर घर गया । इससे मैं कहता हू- वरं बुद्धिर्न सा विद्या विद्याया बुद्धिरुत्तमा । बुद्धिहीना विनश्यन्ति यथा ते सिंहकारकाः ॥ ३९ ॥ बुद्धि अच्छी है विद्या नहीं विद्यासे बुद्धि श्रेष्ठ है बुद्धिहीन पुरुष सिंह बना- नेवालोकी समान नष्ट होते हैं ॥ ३९ ॥ अतः परमुक्तञ्च- औरभी कहा है- अपि शास्त्रेषु कुशला लोकाचारविवर्जिताः । सर्वे ते हास्यतां यांति यथा ते मूर्खपण्डिताः ॥ ४० ॥” शास्त्रमें भी कुशल लोकाचारसे हीन सब वे मूर्खपंडितोकी समान हास्यताको प्राप्त होते हैं ॥ ४० ॥” चक्रधर आह-“कथमेतत् ?” सोऽब्रवीत्- चक्रधर बोला-“यह कैसे ?” वह बोला- कथा ५. कस्मिंश्चित् अधिष्ठाने चत्वारो ब्राह्मणाः परस्परं मित्र- त्वम् आपन्ना वसन्ति स्म । बालभावे तेषां मतिः अजायत । “भो ! देशान्तरं गत्वा विद्याया उपार्जनं क्रियते” । अथ अन्यस्मिन् दिवसे ब्राह्मणाः परस्परं निश्चयं कृत्वा विद्योपा