पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(६) पञ्चतन्त्र भाषाटीकाकी- कालक्रमसे इस ग्रन्थका सौरभ जब देश विदेशमे विकीर्ण हुआ तब परदेश के अनेक गुणग्राही इस देशमें आकर इस अपूर्व मधुको ग्रहण करने लगे, क्रमसे यह और इनका दूसरा ग्रन्थ हितोपदेश पृथ्वीके नानादेशोंमें अनेक भाषा और अनेक आकारसे प्रचलित हुए (१) इसकी नीतिगर्भित कथायें असभ्य जातियोंमें भी अनेक नामसे प्रचलित हुई हैं । ऐशिया, यूरोप, अमेरिकाआदि सम्पूर्ण देशोंके सम्पूर्ण धर्मावलम्बी लोक सिद्धवाक्यके समान इसके उपदेशोंमें श्रद्धा और भक्ति करते हैं । पंचतंत्रके कर्ता किस समय किस स्थानमें प्रादुर्भूत हुए, विष्णुशर्मा उनका प्राकृत नाम है कि नहीं, यह सम्पूर्ण ऐतिहासिक वृत्तान्त स्पष्टरूपसे जाननेका कोई उपाय नहीं, कारण कि, भारतवर्षके प्राचीन आचायोंने कही अपने ग्रन्थोंमें अपना लौकिक परिचय नहीं दिया है, वह किस समय, किस देश, किस कुल, किस अवस्थामें प्रादुर्भूत हुए थे, क्या आकृति थी इत्यादि आधुनिक ऐतिहासिक परिचय कुछ भी नहीं जाना जाता और उन्हे आत्मपरिचय देने- की आवश्यकता भी क्या थी । वे सम्पूर्णरूपसे अपनेको भुलाकर तन्मय भाव- से ज्ञानचिन्तामें मग्न थे । वह महायोगी सिद्धिलाभ करके ही आत्माको चरितार्थ ज्ञानमय करतेथे । ग्रन्थमें ग्रन्थकारका नाम धाम आदि परिचय देनेमें उनकी इच्छा ही नहीं होतीथी; रामायण, महाभारत, हरिवंशादि ग्रन्थोंमें भी अपरिमित प्रभावशाली उन ऋषियोंने अपना नाम धामका उल्लेख नहीं किया है, वाल्मीकि व्यास यह प्रकृत नाम नहीं हैं किन्तु वल्मीकसे प्राप्त होनेसे वाल्मि- कि और वेद विभागकरनेसे वेदव्यास 'व्यास' नाम हुआहै । इन महर्षियोंके निर्माणकिये ज्ञानकाण्डकी ब्रह्मासे स्तम्बपर्यन्त व्याप्त होनेवाली विशालता देख- कर तथा उनमें एक एककी आकृतिका ध्यान करके सन्मुख एक एक महानु- भावकी विशाल मूर्ति आविर्भूत होती है । यद्यपि उन्होंने अपना लौकिक परिचय नहीं दियाहै परन्तु जो मनुष्योंका यथार्थ परिचय है वह उस अलौ- किक ज्ञानका परिचय प्रदान करगये हैं, वे जीवलोकके कल्याण करनेको यह अमूल्य ज्ञानधन संचय करगये हैं, इसकारण उनका आत्मपरिचय तो चन्द्र सूर्यकी स्थितिपर्यंत है महावीर कर्णने कहाहै- (१) हिब्रु, लाटिन, ग्रीक, सायरिअ, इटेलिक, जर्मनी, फ्रेंच, स्पेनिश, अरबी, पारसी, तुरुष्क, चीन, उर्दू, अंग्रेजी, बंगला, प्रभृति पृथ्वीकी प्राचीन व आधुनिक जितनी भाषा हैं सबमें गद्य और पद्यमें पंचतंत्र और हितोपदेशका अनुवाद है ।