पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४९० ) पञ्चतन्त्रम् । कश्चित् व्यन्तरः सिद्धः, स वाञ्छितं प्रयच्छति, तदहं त्वां प्रष्टुम् आगतः । तत्कथय किं प्रार्थये ? एष तावत् मम मित्रं नापितो वदति एवं यत् राज्यं प्रार्थयस्व” । सा आह,- “आर्य्य पुत्र ! का मतिर्नापितानाम् । तत न कार्य्य तद्वचः । उक्तञ्च- कौलिक बोला,-“तौभी उससे पूंछना चाहिये । कारण कि वह पतिव्रता है । और उसके बिना पूछे मैं कुछभी नहीं करता । ऐसा उससे कह शीघ्र जाकर उससे बोला,-“प्रिये ! हमको आज कोई व्यन्तर सिद्ध हुआ है वह मनोवांछित देता है सो मैं तुमको पूछनेको आया हूं । सो कह क्या मांगूं ? । और यह मेरा मित्र नाई तो कहता है कि राज्यकी प्रार्थना करो” । वह बोली- “स्वामिन् नाईयोंको क्या बुद्धि होती है। सो उसके वचन न करना। कहा है कि- चारणैर्बन्दिभिर्नीचैर्नापितैर्बालकैरपि । न मन्त्रं मतिमान्कुर्यात्सार्द्धं भिक्षुभिरेव च ॥ ६७ ॥ चारण, बन्दीजन, नीच, नापित और बालकों भिक्षुकोंके साथ बुद्धिमान सम्मति न करे ॥ ६७ ॥ अपरं महती क्लेशपरम्परा एषा राज्यस्थितिः सन्धिविग्र- हयानासनसंश्रयद्वैधीभावादिभिः कदाचित् पुरुषस्य सुखं न प्रयच्छतीति । यतः- और यह राज्यकी स्थिति तो बडे क्लेशकी करनेवाली है। संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय, द्वैधीभावादिसे कभी पुरुषको सुख नहीं मिलता । कारण कि- यदैव राज्ये क्रियतेऽभिषेकस्तदैव याति व्यसनेषु बुद्धिः । घटा नृपाणामभिषेककाले सहाम्भसैवापद्मुद्गिरन्ति ६८॥ जबी राज्य अभिषेक किया जाता है उसी समय व्यवसनोंमें बुद्धि लग जाती है राजोंके अभिषेक समयमें घडे जलोंके साथ आपत्तिको उद्गीर्ण करते हैं ॥ ६८ ॥ तथाच- और देखो- रामस्य व्रजनं वने निवसनं पण्डोः सुतानां वने वृष्णीनां निधनं नलस्य नृपते राज्यात्परिभ्रंशनम् !