भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । (५०१) सुनकर रत्नमाला देकर बोला,-“भो मित्र ! जो उचित समझो सो करो” । वानरभी रत्नमालासे भूषित कण्ठ होकर वृक्ष और महलोंपर घूमता हुआ जनोंसे देखा और पूछा गया.-“भो यूथप ! आप इतने समयतक कहा थे ? आपने ऐसी रत्नमाला कहा पाई ? जो कान्तिसे सूर्यकोभी तिरस्कार करती है” । वानरने कहा,- एक वनमें गुप्त बडा सरोवर कुबेरका बनाया है वहा सूर्यके आधा निकलनेपर इतवारको जो मनुष्य स्नान करे वह कुबेरके प्रसादसे इस प्रकार भूषितकण्ठ हो निकलता है” । तब राजाने यह सुन उस वानरको बुलाकर पूछा,-“भो ! यूथपति क्या यह सत्य है ?” । वानरने कहा,-“स्वामिन् यह प्रत्यक्ष मेरे कण्ठमें स्थित रत्नमालाही आपको विश्वास कराती है। सो यदि रत्न- मालासे प्रयोजन है तौ मेरे संग किसीको भेजो जिसे दिखाऊ” यह सुनकर राजा बोला,-“जो ऐसा है तो मै परिजनसहित स्वय जाऊगा । जिससे रत्न- माला प्राप्त हो” । वानर बोला,-“ऐसा ही करो” । ऐसा कहनेपर राजाने रत्न- मालाके लोभसे सब स्त्री भृत्य भेजे । और वानरकाभी राजा पालकीमें अपनी गोदमे बैठाय सुखसे प्रीतिपूर्वक ले चला” । अथवा यह अच्छा कहा है- तृष्णे देवि ! नमस्तुभ्यं यया वित्तान्विता अपि । अकृत्येषु नियोज्यन्ते भ्राम्यन्ते दुर्गमेष्वपि ॥ ८२ ॥ हे तृष्णा देवि ! तुमको नमस्कार है, जिससे धनी पुरुषभी अकार्योंमें नियुक्त कर दुर्गम स्थानोंमें भ्रमाये जाते हैं ॥ ८२ ॥ तथाच- और देखो- इच्छति शती सहस्रं सहस्री लक्ष्मीहते । लक्षाधिपस्तथा राज्यं राज्यस्थः स्वर्गमीहते ॥ ८३ ॥ सौवाला सहस्रकी, सहस्रवाला लाखकी, लक्षाधिप राज्यकी ओर राज्याधिप स्वर्गकी इच्छा करता ह ॥ ८३ जीर्यन्ते जीर्यतः केशा दन्ता जीर्यन्ति जीर्यतः । जीर्यतश्चक्षुषी श्रोत्रे तृष्णैका तरुणायते ॥ ८४ ॥” जीर्ण होनेसे केश जीर्ण होते हैं, जीर्ण होनेसे दात जीर्ण होजाते हैं, नेत्र श्रोत्रभी जीर्ण होते हैं, एक तृष्णाही तरुण होती जाती है ॥ ८४ ॥”