भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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भाषाटीकासमेतम् । (५०३) सो तैने मेरा कुलक्षय किया मैंने तेरा”। तब यह बचन सुन राजा महाक्रो- धित हो पैरो इकला जिधरसे आया था उस मार्गसे चला । तब उस राजाके जानेपर तृप्त हुआ राक्षस जलसे निकल आनन्दसे यह बोला- “हतः शत्रुः कृतं मित्रं रत्नमाला न हारिता । नालेनापिबता तोयं भवता साधु वानर ॥ ८६ ॥” “हे वानर आपने पद्मनालसे जल पीकर शत्रु मारा, मुझसे मित्रता की, मेरी रत्नमाला भी न खोई, धन्य हो ! ॥ ८६ ॥” अतोऽहं ब्रवीमि- इससे मैं कहता हू- यो लौल्यात्कुरुते कर्म नैवोदर्कमवेक्षते । विडम्बनामवाप्नोति स यथा चन्द्रभूपतिः ॥ ८७ ॥” जो चञ्चलतासे कर्म करके उसका परिणाम नहीं सोचता है वह चन्द्र राजाकी समान विडम्बनाको प्राप्त होता है ॥ ८७ ॥” एवमुक्त्वा भूयोऽपि स चक्रधरमाह,-“भो मित्र ! प्रेषय मां येन स्वगृहं गच्छामि”। चक्रधर आह,-“भद्र ! आपदर्थे धनमित्रसंग्रहः क्रियते । तत् माम् एवंविधं त्यक्त्वा क्व यास्यसि । उक्तञ्च- ऐसा कह फिर भी चक्रधरसे बोला--“मुझे जाने दो जो मैं अपने घर जाऊं”। चक्रधर बोला,-“भद्र ! आपत्तिके निमित्त धन और मित्रका संग्रह किया जाता है, सो इस प्रकार मुझे छोडकर कहा जाता है ? कहा है-- यस्त्यक्त्वा सापदं मित्रं याति निष्ठुरतां सुहृत् । कृतघ्नस्तेन पापेन नरके यात्यसंशयम् ॥ ८८ ॥” जो सुहृत् आपत्तिमें मित्रको छोडकर निष्ठुर हो जाता है वह कृतघ्न उस पापसे अवश्य नरकको जाता है ॥ ८८ ॥” सुवर्णसिद्धिः आह,-“भोः ! सत्यमेतत् यदि गम्यस्थाने शक्तिर्भवति । एतत्पुनः मनुष्याणाम् अगम्यस्थानम् । नास्ति कस्यापि त्वाम् उन्मोचयितुं शक्तिः । अपरं यथा यथा चक्र- भ्रमवेदनया तव मुखविकारं पश्याम तथा तथा अहमेतत् जा- नामि यत् द्राक् गच्छामि मा कश्चित् ममापि अनर्थो भवतु। यतः-