पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[Header]: भाषाटीकासमेतम् । (३९)
विश्वासके बिना तो देवताभी शत्रुको सिद्ध नहीं कर सकते, विश्वाससेही इन्द्रने दितिका गर्भनाश कर दिया ॥ १२६ ॥" एवं सम्प्रधार्य स्थानान्तरं गत्वा दमनकमार्गमवलोकयन् एकाकी तस्थौ । दमनकोऽपि सञ्जीवकसकाशं गत्वा वृषभोऽ- यमिति परिज्ञाय हृष्टमना व्यचिन्तयत् । "अहो ! शोभन- मापतितम् अनेन एतस्य सन्धिविग्रहद्वारेण मम पिंगलको वश्यो भविष्यति इति । उक्तञ्च- ऐसा विचारकर अन्यस्थानमें जाय दमनककी बाट देखता हुआ इकल्ला स्थित रहा । दमनकभी सजीवकके निकट जाकर यह बैल है ऐसा जानकर प्रसन्न हो विचारने लगा "आहा ! यह तो अच्छी बात हुई । इसके साथ उसकी संधि विग्रह होनेसे पिंगलक मेरे वशीभूत हो जायगा । कहाभी है- न कौलीन्यान्न सौहार्दान्नृपो वाक्ये प्रवर्त्तते । मन्त्रिणां यावदभ्येति व्यसनं शोकमेव च ॥ १२७ ॥ कुलीनता और सुहृदतासे राजा मंत्रियोंके वाक्यमें प्रवृत्त नहीं होताहै जबतक कि, उसको व्यसन और शोककी प्राप्ति नहीं होती ॥ १२७ ॥ सदैववापद्गतो राजा भोग्यो भवति मन्त्रिणाम् । अत एव हि वाञ्छन्ति मन्त्रिणः सापदं नृपम् ॥ १२८ ॥ आपत्तिमें प्राप्त हुआ राजा मन्त्रियोंको सदा भोग्य होताहै, इसकारण मंत्री राजाको आपत्तियुक्त रहनेकीही इच्छा करतेहैं ॥ १२८ ॥ यथा नेच्छति नीरोगः कदाचित्सुचिकित्सकम् । तथापद्रहितो राजा सचिवं नाभिवाञ्छति ॥ १२९ ॥" जैसे निरोगी कभी वैद्यकी इच्छा नहीं करता, इसी प्रकार आपत्तिरहित राजा कभी मंत्रीकी इच्छा नहीं करता ॥ १२९ ॥" एवं विचिन्तयन् पिंगलकाभिमुखः प्रतस्थे । पिंगलकोऽपि तमायान्तं प्रेक्ष्य स्वाकारं रक्षन् यथापूर्वमवस्थितः । दम न- कोऽपि पिंगलकसकाशं गत्वा प्रणम्य उपविष्टः । पिंगलक आह-"किं दृष्टं भवता तत् सत्त्वम्"? । दमनक आह-"दृष्टं १ देखो भागवतपर हमारी टीका ।