पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ४४ ) पञ्चतन्त्रम् ।
बोला-स्वामिन् ! मैने यह कहा कि "यह वन चण्डिकाके वाहनभूत हमारा स्वामी पिंगलक नाम सिंहका अधिकृतहै, सो आप अभ्यागत प्रिय अतिथि प्राप्त हो सो उस (स्वामी) के पास चलकर भ्रातृस्नेहसे एक स्थानमेंही भक्षण पान विहार क्रियासे एक स्थानमें रहकर समय व्यतीत करो, तब उसने यह सब स्वी- कार करके प्रसन्न हो कहा-‘स्वामीके निकटसे अभयदक्षिणा दिवाओ, सो इसमें स्वामीही प्रमाण है” यह सुनकर पिंगलक बोला-“धन्य बुद्धिमान् धन्य । मानो यह मेरे हृदयसेही सम्मति करके तैने कहा। मैने उसको अभय दक्षिणा दी, परन्तु उससेभी मेरे निमित्त अभय दक्षिणा दिवाकर शीघ्र लाओ। ठीकही कहा है- अन्तःसारैरकुटिलैरच्छिद्रैः परीक्षितैः । मन्त्रिभिर्धार्यते राज्यं सुस्तम्भैरिव मन्दिरम् ॥ १३७॥ सारवान् कुटिलतासे रहित निर्दोष अच्छी प्रकार परीक्षा किये हुए मंत्रियोंसे राज्य धारण कियाजाताहै जैसे अच्छे स्तम्भोंसे मन्दिर ॥ १३७ ॥ तथाच- और भी- मन्त्रणां भिन्नसन्धाने भिषजां सान्निपातिके । कर्मणि व्यज्यते प्रज्ञा स्वस्थे को वा न पण्डितः ॥१३८॥” अयुक्तके युक्त करनेमें मन्त्रियोंकी सन्निपातके कर्म ( व्यापार ) में वैद्योंकी बुद्धि देखी जातीहै स्वस्थतामें कौन पंडित नहीं होताहै ॥ १३८ ॥ दमनकोऽपि तं प्रणम्य सञ्जीवकसकाशं प्रस्थितः सहर्षमचि- न्तयत् । "अहो ! प्रसादसन्मुखो नः स्वामी वचनवशगश्च संवृ- त्तस्तन्नास्ति धन्यतरो मम । उक्तञ्च- दमनकभी उसको प्रणाम कर संजीवकके समीप गया, और प्रसन्नतासे विचारने लगा “अहो इस समय स्वामी हमपर प्रसन्न है वचनके वशीभूत है सो इस समय मुझसे अधिक धन्य और कौनहै। कहाभी है- अमृतं शिशिरे वह्निरमृतं प्रियदर्शनम् । अमृतं राजसम्मानममृतं क्षीरभोजनम् ॥ १३९॥ जाड़ेमें अग्नि अमृत है, प्रियदर्शन अमृत है, राजसन्मान अमृत है, तथा क्षीर भोजन अमृत है ॥ १३९ ॥