पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( ४९ ) स्मित लाल अधरकी कान्तिवाली किसीके साथ थोडा बोलती है, स्फुरित खिली कुमुदिनीकी समान किसीको देखती हैं, विचित्र चारित्रवाले विविध सम्प- त्तिमान् अन्य पुरुषको बुद्धिसे ध्यान करती हैं, स्त्रियोंका यथार्थ और सत्य प्रेम किसके साथ है ? किसीके नहीं. (शार्दूल विक्रीडित छन्द) ॥ १४७ ॥ तथाच- तैसाही- नाग्निस्तृप्यति काष्ठानां नापगानां महोदधिः । नान्तकः सर्वभूतानां न पुंसां वामलोचना ॥ १४८ ॥ अग्नि काष्ठोंसे, सागर नदियोंसे, काल सब प्राणियोंसे, और स्त्री पुरुषोंसे तृप्त नहीं होती हैं ॥ १४८ ॥ रहो नास्ति क्षणो नास्ति नास्ति प्रार्थयिता नरः । तेन नारद नारीणां सतीत्वमुपजायते ॥ १४९ ॥ एकान्त नहीं है, अवकाश नहीं है, प्रार्थना करनेवाला मनुष्य नहीं है, हे नारद ! इसी कारण स्त्रियोंका सतीत्व रहताहै ॥ १४९ ॥ यो मोहान्मन्यते मूढो रक्तेयं मम कामिनी । स तस्या वशगो नित्यं भवेत्क्रीडाशकुन्तवत् ॥ १५० ॥ जो मनुष्य मूर्ख अज्ञानसे यह जानता है कि, यह स्त्री मुझसे अनुरक्त है, वह मनुष्य उसके वशीभूत होकर क्रीडाका पक्षीसा होजाताहै ॥ १५० ॥ तासां वाक्यानि कृत्यानि स्वल्पानि सुगुरूण्यपि । करोति यः कृती लोके लघुत्वं याति सर्वतः ॥ १५१ ॥ जो कृती पुरुष स्त्रियोंके छोटे बडे, थोडे या बहुत वाक्योंकोभी करताहै वह सब प्रकारसे लघुताको प्राप्त होता है ॥ १५१ ॥ स्त्रियश्च यः प्रार्थयते सन्निकर्षञ्च गच्छति । ईषच्च कुरुते सेवां तमेवेच्छन्ति योषितः ॥ १५२ ॥ जो स्त्रीकी प्रार्थना करता है और उनके निकट जाताहै और थोडीभी सेवा करता है स्त्री उसीकी इच्छा करती हैं ॥ १५२ ॥ अनर्थित्वान्मनुष्याणां भयात्परिजनस्य च । मर्याद्दायाममर्याद्दाः स्त्रियस्तिष्ठन्ति सर्वदा ॥ १५३ ॥ ४