पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ५२ ) पञ्चतन्त्रम् ।
अर्धचन्द्र (गलहस्त) भागी होंगे" यह सुनकर दन्तिल विचारने लगा-"यह अवश्यही इस गोरम्भकी चेष्टा है। अथवा ठीक कहा है कि- अकुलीनोऽपि मूर्खोऽपि भूपालं योऽत्र सेवते । अपि सम्मानहीनोऽपि स सर्वत्र प्रपूज्यते ॥ १५९ ॥ चाहें कुलीन या मूर्ख कोईभी राजाकी सेवा करता हो सम्मानसे हीनभी वह सर्वत्र पूजित होता है ॥ १५९ ॥ अपि कापुरुषो भीरुः स्याच्चेन्नृपतिसेवकः। तथापि न पराभूतिं जनादाप्नोति मानवः ॥ १६० ॥" चाहें कापुरुष डरपोक भी राजाका सेवक हो तो वह किसीसे पराभवको प्राप्त नहीं होताहै ॥ १६० ॥" एवं स बहुविधं विलप्य विलक्षमनाः सोद्वेगो गतप्रभावः स्वगृहं गत्वा निशामुखे गोरम्भमाहूय वस्त्रयुगलेन सम्मान्य इदमुवाच-"भद्र ! मया न तदा त्वं रागवशात् निःसा- रितः । यतस्त्वं ब्राह्मणानामग्रतोऽनुचितस्थाने समुपविष्टो दृष्ट इति अपमानितः । तत् क्षम्यताम्" । सोऽपि स्वर्गरा- ज्योपमं तद्वस्त्रयुगलमासाद्य परं परितोषं गत्वा तमुवाच- "भोः श्रेष्ठिन् ! क्षान्तं मया ते तत् । तदस्य सम्मानस्य कृते पश्य मे बुद्धिप्रभावं राजप्रसादञ्च" । एवमुक्त्वा सपरितोषं निष्क्रान्तः । साधु चेदमुच्यते- इसप्रकार अनेकविध तापित होकर लज्जितमन और उद्वेगसे प्रभावहीन वह (दन्तिल) घर जाकर रात्रिमें गोरम्भको बुलाय दो वस्त्रोंसे सम्मानकर यह बोला- "भद्र ! मैंने उससमय तुझको क्रोधवशसे नहीं निकाला था । परन्तु जो कि, तू ब्राह्मणोंके आगे अनुचित स्थानपर बैठा देखागया इससे तिरस्कृत किया सो क्षमाकरो" । वह स्वर्गराज्यकी समान वस्त्रद्वयको प्राप्तहो परमसन्तुष्टतासे उससे बोला,-"भो श्रेष्ठ ! मैंने वह सब शान्त किया । सो इस सन्मानके करनेसे मेरे बुद्धिप्रभाव और राजप्रसादको देखो" यह कह सन्तुष्टतासे चला गया । यह अच्छाही कहा है- "स्तोकेनोन्नतिमायाति स्तोकेनायात्यधोगतिम् । अहो सुसदृशी चेष्टा तुलायष्टेः खलस्य च ॥ १६१ ॥"