भारतकोश
पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)

पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा

स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)

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(६४) पञ्चतन्त्रम् । लेकर पलायन करगया। देवशर्माभी शिष्यके गुणोंसे अनुरंजितमन होकर विश्वा- सकर जबतक स्थितरहा तबतक सुवर्णरोम (जन्तु) के यूथमें हुडनामक जीवका युद्ध देखने लगा। तब रोषके कारण दोनो हुड पीछे हटकर फिरभी बडे वेगसे आकर मस्तकमें प्रहार करते जिससे बडा रुधिर निकलता था। वहां एक गीदड जिह्वाके लौल्यसे रंगभूमिमें प्रवेशकर रुधिर खाता था। देवशर्माभी इसको देख- कर विचार करने लगा।"अहो यह गीदड मन्दमति है,यदि किसी प्रकारसे इन दोनोंके संघट्टमें प्राप्त होगा तो अवश्य मृत्युको प्राप्त होगा ऐसी मैं तर्कना कर- ताहूं"। उसीक्षणमें रुधिर आस्वादानकी चंचलतासे बीचमें प्रवेश करताहुआ उनके शिरके झटकेसे शृगाल मृतक भया, देवशर्माभी उसको सोचकरता हुआ धनका स्मरण कर शनैः २ चलकर जबतक आषाढभूतिको नहीं देखताहै तब- तक उत्कंठासे शौच करके ज्योंही गुदडीको देखा कि, उसमें मात्राको न पाया तब "हाय ! हाय ! मै ठगा गया" यह कहकर पृथ्वीमे मूर्च्छित हो गिरा। फिर चेतनताको प्राप्त होकर उठ श्वास लेने लगा "भो आषाढभूति ! मुझे ठगकर कहां गया ? मुझे उत्तर तो दे"इसप्रकार बहुत विलाप कर उसके पैरोंके चिन्हके अनुसरण क्रमसे खोजता हुआ शनैः २ चला। यौं जाताहुआ संध्यासमय किसी गांवमें प्राप्त हुआ, उस गांवसे कोई कौलिक स्त्रीके सहित मद्यपान किये नगरके समीप चलाथा। देवशर्माभी उसको देखकर बोला- "भो भद्र! हम सूर्योढ (सन्ध्या समय गृहस्थियोंके घरजानेवाले) अतिथि तुम्हारे निकट प्राप्त हुए हैं किसीको इस गांवमें नहीं जानते सो अतिथिधर्म स्वीकार कीजिये। कहाहै- संप्राप्तो योऽतिथिः सायं सूर्योढो गृहमेधिनाम् । पूजया तस्य देवत्वं प्रयान्ति गृहमेधिनः ॥ १८१ ॥ जो अतिथि गृहस्थियोके यहां संध्यासमय (सूर्यछिपनेके समय) प्राप्तहो गृहस्थी उसकी पूजाकरे तो देवत्वको प्राप्त होते हैं ॥ १८१ ॥ तथाच- तैसेही- तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता । सतामेतानि हर्म्येषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥ १८२ ॥ तृण, भूमि, जल और चौथी सत्य मधुर वाणी यह सत्पुरुषोंके घरसे कदा- चित् भी नष्ट नहीं होतीहैं ॥ १८२ ॥