पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र)
पण्डित विष्णु शर्मा द्वारा
स्रोत: पंचतन्त्रम् (सटीक - सम्पूर्ण पाँचों तन्त्र) · श्रीवेङ्कटेश्वर स्टीम प्रेस, बम्बई · 1910 (उद्गम)
(५१८) पञ्चतन्त्रम् ।
(५१८) पञ्चतन्त्रम् । वोऽयं मार्गः, कार्यवशात् एकाकी गमिष्यामि"। अथ तस्य तं निश्चयं ज्ञात्वा समीपस्थवाप्याः सकाशात् कर्कटम् आ- दाय मात्रा अभिहितः,-" वत्स ! अवश्यं यदि गन्तव्यं तदेष कर्कटोऽपि सहायः भवतु । तत एनं गृहीत्वा गच्छ"। सोऽपि मातृवचनात् उभाभ्यां पाणिभ्यां तं संगृह्य कर्पूर- पुटिकामध्ये विधाय पात्रमध्ये संस्थाप्य शीघ्रं प्रस्थितः । अथ गच्छन् ग्रीष्मोष्मणा सन्तप्तः कश्चित् मार्गस्थं वृक्षम् आसाद्य तत्रैव प्रसुप्तः । अत्रान्तरे वृक्षकोटरात् निर्गत्य सर्पः स्तत्समीपम् आगतः । सोऽपि कर्पूरसुगन्धसहजप्रियत्वात् तं परित्यज्य वस्त्रं विदार्य्य अभ्यन्तरगतां कर्पूरपुटिकामतिलौ- ल्यात् अभक्षयत् । सोऽपि कर्कटः तत्रैव स्थितः सन् सर्पप्रा- णान् अपाहरत् । ब्राह्मणोऽपि यावत् प्रबुद्धः पश्यति तावत् समीपे कृष्णसर्पो निजपार्श्वे कर्पूरपुटिकोपरि स्थितः तिष्ठति। तं दृष्ट्वा व्यचिन्तयत् ।" कर्कटेन अयं हत इति प्रसन्नो भूत्वा अब्रवीत्,-"भोः सत्यम् अभिहितं मम मात्रा यत् पुरुषेण कोऽपि सहायः कार्यो न एकाकिना गन्तव्यम्" । यतो मया श्रद्धापूरितचेतसा तद्वचनम् अनुष्ठितम्। तेनाहं कर्कटेन सर्प- व्यापादनात् रक्षितः । अथवा साधु इदमुच्यते- किसी स्थानमें ब्रह्मदत्तनामक ब्राह्मण रहता था। वह प्रयोजनसे गांवको जाने लगा तब उसकी माताने कहा,-"पुत्र ! क्यों इकल्ला जाता है ? सो कोई दूसरा सहायक खोजो"। वह बोला,-"मा ! मत डरो, यह मार्ग उपद्रवरहित है। कार्यवशसे इकल्लाही जाऊंगा"। तब उसके इस निश्चयको जानकर समीप स्थित बावडीमेंसे केंकडेको लाकर माताने कहा-"पुत्र ! यदि अवश्य जातेही हो तो तो यह केकडाभी तुम्हारा सहायक होगा। सो इसको लेकर जाभो"। वहभी माताके वचनसे दोनों हाथोंसे उसको ग्रहण कर कर्पूरकी पिटका (थैली) में डाल पात्रमें रखकर शीघ्रतासे चला। तब जाते हुए गरमीकी ज्वालासे घबडाकर किसी मार्गमें स्थित वृक्षको प्राप्त होकर वहां सोगया । इसी समय वृक्षकी खखोडलमेंसे निकल कर सर्प उसके समीप आया, वहभी कपूर सुग- न्धिको स्वभावसे प्यार करनेसे, उसे छोड वस्त्रको विदीर्ण कर भीतर धरी हुई कपूरकी पोटली अति चपलतासे भक्षण करनेलगा। वह केंकडा उसमें स्थित
भाषाटीकासमेतम् । (५१९) हुआ सर्पके प्राण हरता हुआ । ब्राह्मण भी जबतक जागकर देखता है तो समीपही काला सांप अपने निकट कपूरकी पोटलीके ऊपर स्थित है । "कर्क- टने इसको मारा" ऐसा विचारकर प्रसन्न होके बोला,-"भो ! मेरी माताने सच कहाथा कि, जो "पुरुषको कोई सहायकारी रखना चाहिये इकले न जाना चाहिये" । और जो मैंने श्रद्धासे पूर्ण चित्तसे उसके वचन माने । इसीसे मैं कर्कटद्वारा सर्पको मारनेसे बचा । अथवा यह अच्छा कहा है-- क्षीणः स्रवति शशी रविवृद्धौ वर्द्धयति पयसां नाथम् । अन्ये विपदि सहाया धनिनां श्रियमनुभवन्त्यन्ये ॥ १०५ ॥ आदमीको विपत्ति आनेपर सहायता करनेवाले और होतेहैं तथा संपत्तिके अनुभव तो औरही करतेहैं, जैसे सूर्यकी सहायतासे बढाहुवा चन्द्रमा क्षीण होनेपरभी अमृतको वर्षाताहै और समुद्रको बढाताहै ॥ १०५ ॥ मन्त्रे तीर्थे द्विजे देवे दैवज्ञे भेषजे गुरौ । यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी ॥ १०६ ॥" मन्त्र, तीर्थ, ब्राह्मण, देवता, ज्योतिषी, औषधी, गुरु इनमें जैसी जिसकी भावना होती है वैसेही सिद्धि होती है ॥ १०६ ॥" एवमुक्त्वा असौ ब्राह्मणो यथाभिप्रेतं गतः । अतोऽहं ब्रवीमि- ऐसा कह यह ब्राह्मण अभिलाषित स्थानको गया । इससे मैं कहता हूं- “अपि कापुरुषो मार्गे द्वितीयः क्षेमकारकः । कर्कटेन द्वितीयेन सर्पात्पान्थः प्ररक्षितः ॥ १०७ ॥" "कि कायर पुरुष भी मार्गमें दूसरा हितकारक होता है दूसरे केंकड़ेने बटो- हीकी सर्पसे रक्षा की ॥ १०७ ॥" एवं श्रुत्वा सुवर्णसिद्धिः तमनुज्ञाप्य स्वगृहं प्रति निवृत्तः। यह सुनकर सुवर्णसिद्धि उसकी आज्ञासे अपने घरके प्रति गया इति श्रीविष्णुशर्मविरचिते पञ्चतन्त्रे अपरीक्षित- कारकं नाम पञ्चमं तन्त्रं समाप्तम् । इति श्रीविष्णुशर्मविरचिते पंचतंत्रके पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृतभाषाटीकायां अपरीक्षितकारक (विनाविचारेकरना) नाम पञ्चमंतंत्रं समाप्तम् । ॥ शुभं भवतु ॥
( ९२० ) पञ्चतन्त्रम् ।
( ९२० ) पञ्चतन्त्रम् । दोहा-सीतापति रघुनाथश्री, भरत लषण हनुमान । हिये शत्रुसूदन सुमर, सज्जनको सुखदान ॥ १ ॥ पञ्चतन्त्रभाषा तिलक, कीन्हों मति अनुसार । बारबार शिवपद सुमर, बुधजन प्राण अधार ॥ २ रामनवमि तिथिमेषरवि, कियो संक्रमण आज । प्रेम सहित पूजे सबन, अवधराज महाराज ॥ ३ ॥ सम्वत् युगशर अंकविधु, चैत्रशुक्ल रविवार । नवमीतिथिको ग्रंथ यह, कीन्हों पूर्ण विचार ॥ ४ ॥ वसत राम गंगा निकट, नगर मुरादाबाद । कियो तिलक अतिशोध कर, द्विज ज्वालाप्रसाद॥५॥ वेंकटेश्वर यंत्र पति, खेमराज गुणवान । तिनको कीन्हों भेंट यह, सकलसुमंगल खान ॥ ६ ॥ रामराम सियराम कहु, रामराम सियराम । राम राम के कहतही, सिद्ध होत सब काम ॥ ७ ॥ बहुरिशारदा शिवाश्री, जगदम्बा गुणगाय । करहुं प्रार्थना जोरकर, कीजे सदा सहाय ॥ ८ ॥ सन्तसमागम जगतमें, सकल सुमंगल मूल । करहिं जो तिनपर लषन युत, राम रहहिं अनुकूल ॥९॥ ॥ शुभमस्तु ॥ पञ्चतन्त्रं भाषाटीकासमेतं समाप्तम् । ━━━━━━━━━━━━━ पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम् प्रेस-बंबई.