पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेतम् । ( १०७ )
तेनापि च वरो दत्तो यस्य दुर्गं स भूपतिः ।
विजयी स्यात्ततो भूमौ दुर्गाणि स्युः सहस्रशः ॥ २५४ ॥
और उसनेभी यह वर दिया था कि, जिसके दुर्ग होगा वही राजा विजयी होगा इस कारण पृथ्वीमें सैकड़ों दुर्ग होगये ॥ २५४ ॥
दंष्ट्राविरहितो नागो मदहीनो यथा गजः ।
सर्वेषां जायते वश्यो दुर्गहीनस्तथा नृपः ॥ २५५ ॥”
जैसे डाढोसे रहित सर्प, मदसे हीन हाथी इसी प्रकार दुर्गहीन राजा शीघ्र अन्योंके वशमें होजाता है ॥ २५५ ॥”
तच्छ्रुत्वा भासुरक आह—“भद्र ! दुर्गस्थमपि दर्शय तं चौरसिंहं येन व्यापादयामि । उक्तञ्च-
यह सुनकर भासुरक बोला,—“भद्र ! किलेमे स्थितभी उस चोर सिंहको दिखाओ जिससे मै उसे मारडालू । कहा है—
जातमात्रं न यः शत्रुं रोगञ्च प्रशमं नयेत् ।
महाबलोऽपि तेनैव वृद्धिं प्राप्य स हन्यते ॥ २५६ ॥
जो उत्पन्न होतेही शत्रु और रोगको अपने वशमे नहीं करता है, वह महाबली हो तथापि उसके साथ वृद्धिको प्राप्तहोकर हनन करता है ॥ २५६ ॥
तथाच—
औरभी कहा है—
उत्तिष्ठमानस्तु परो नोपेक्ष्यः पथ्यमिच्छता ।
समौ हि शिष्टैराम्नातौ वर्त्स्यन्तावामयः स च ॥ २५७ ॥
हितकी इच्छा करनेवाले पुरुषको उठे हुए शत्रुको उपेक्षा नहीं करनी चाहिये, श्रेष्ठ पुरुषोंने वृद्धिको प्राप्त होते हुए शत्रु और रोग समान कहे हैं ॥ २५७ ॥
अपिच—
और देखो—
उपेक्षितः क्षीणबलोऽपि शत्रुः
प्रमाददोषात्पुरुषैर्मदान्धैः ।
साध्योऽपि भूत्वा प्रथमं ततोऽसौ
असाध्यतां व्याधिरिव प्रयाति ॥ २५८ ॥