पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४० ) पञ्चतन्त्रम् ।
संजीवक बोला,—"हम स्वामीके क्रोधित होनेपर अन्य स्थानमें नहीं जा- सकते कारण कि, अन्य स्थानमें जानेसे मंगल नहीं होगा । कहाहै—
महतां योऽपराध्येत दूरस्थोऽस्मीति नाश्वसेत् । दीर्घौ बुद्धिमतो बाहू ताभ्यां हिंसति हिंसकम् ॥ ३३१ ॥
जो बडे पुरुषोका अपराध करता है वह मैं दूरहूं ऐसा विचार नकरे बुद्धि- मान्की दीर्घ बाहु दूरसेभी उस हिंसकको पकडकर मारती है ॥ ३३१ ॥
तद्युद्धं मुक्त्वा मे नान्यदस्ति श्रेयस्करम् । उक्तञ्च— सो युद्धको छोडकर अब और श्रेयस्कर उपाय नहीं है । कहाहै—
न तान् हि तीर्थैस्तपसा च लोकान् स्वर्गैषिणो दानशतैः सुवृत्तैः । क्षणेन यान्यान्ति रणेषु धीराः प्राणान्समुज्झन्ति हि ये सुशीलाः ॥ ३३२ ॥
स्वर्गकी इच्छा करनेवाले उन लोकोंको तीर्थ तप सैकडो दान और सुकृतोंसे नहीं प्राप्त होते हैं जहां धैर्यवान् सुशीळ पुरुष युद्धकर क्षणमात्रमें प्राप्तहोते हैं ॥ ३३२ ॥
मृतैः सम्प्राप्यते स्वर्गो जीवद्भिः कीर्त्तिरुत्तमा । तदुभावपि शूराणां गुणावेतौ सुदुर्लभौ ॥ ३३३ ॥
मरनेसे स्वर्ग और जीनेसे उत्तम कीर्त्ति प्राप्त होती है यह दोनों गुण शूर पुरुषोंके दुर्लभ हैं ॥ ३३३ ॥
ललाटदेशे रुधिरं स्रवत्तु शूरस्य यस्य प्रविशेच्च वक्रे । तत्सोमपानेन समं भवेच्च संग्रामयज्ञे विधिवत्प्रदिष्टम् ॥३३४॥
जिस शूरके माथेसे बहता हुआ रुधिर मुखमें प्रवेश करता है वह विधिपूर्वक संग्रामयज्ञमें प्राप्त हुआ सोमपानकी समान होता है ॥ ३३४ ॥
तथाच- और देखो—
होमार्थैर्विधिवत्प्रदानविधिना सद्दिप्रवृन्दार्चनैः यज्ञैर्भूरिसुदक्षिणैः सुविहितैः सम्प्राप्यते यत्फलम् ।