भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम्। ( १४६ )

वर्त्तते''। तच्छ्रुत्वा कम्बुग्रीव आह--“भोः! साम्प्रतं न अस्ति अस्माकं जीवितव्यं जलाभावात्। तथापि उपायश्चिन्त्यतामिति। उक्तञ्च-

किसी सरोवरमे कम्बुग्रीव नाम कच्छप रहता था उसके संकट विकटनामवाले हंसजातिके दो मित्रपरम स्नेहकी कोटिको प्राप्तहुए नित्यही सरोवरके समीप रहतेथे। उसके साथ अनेक देवर्षि महर्षियोंकी कथाकर सूर्यास्तके समय अपने घोंसलेका आश्रय करते। फिर कुछ दिनोंके उपरान्त अवर्षणसे सरोवर शनैः २ सूखने लगा, तब उसके दुःखसे दुखी हुए वोह बोले,-“हे मित्र ! यह सरोवर तो कर्दम ( कीच ) मात्र अवशेष है सो आप कैसे रहेंगे यह व्याकुलता हमारे हृदयमें है” सो सुनकर कम्बुग्रीव बोला,-“भो ! इस समय जलके अभावसे हमारा जीवन नहीं होगा तो भी उपाय विचारो। कहाहै-

त्याज्यं न धैर्य्यं विधुरेऽपि काले धैर्यात्कदाचिद्गतिमाप्नुयात्सः। यथा समुद्रेऽपि च पोतभङ्गे सांयात्रिको वाञ्छति तर्तुमे ॥ ३४५ ॥

प्रारब्धके विगड जानेमेंभी धैर्य त्यागना करना न चाहिये कदाचित् धैर्यसे उसकी गति प्राप्त होजाय अर्थात् उपाय प्राप्त होजाय, जैसे सागरमें पोत ( जहाज ) भंग होनेपर पोतवणिक् धैर्यसे तरनेहीकी इच्छा करताहै ॥ ३४५ ॥

अपरञ्च- औरभी-

मित्रार्थे बान्धवार्थे च बुद्धिमान्यतते सदा। जातास्वापत्सु यत्नेन जगादेदं वचो मनुः ॥ ३४६ ॥

बुद्धिमान् सदा मित्र और बांधवोंके निमित्त यत्न करे चाहे कैसीभी विपत्तिहो मनुने यह वचन कहाहै ॥ ३४६ ॥

तद् आनीयतां काचित् दृढरज्जुर्लघु काष्ठं वा, अन्विष्यतां च प्रभूतजलसनाथं सरो येन मया मध्यप्रदेशे दन्तैर्गृहीते सति युवां कोटिभागयोः तत्काष्ठं मया सहितं संगृह्य

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