भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेतम्। (१४७)

कथा १४.

कस्मिंश्चित् जलाशये अनागतविधाता प्रत्युत्पन्नमतिः यद्भविष्यश्चेति त्रयो मत्स्याः सन्ति । अथ कदाचित् तं जलाशय दृष्ट्वा गच्छद्भिर्मत्स्यजीविभिरुक्तं “यदहो ! बहुमत्स्योऽयं ह्रदः कदाचिदपि नास्माभिरन्वेषितः । तदद्य तावदाहारवृत्तिः सञ्जाता, सन्ध्यासमयश्च संवृत्तः ततः प्रभातेऽत्र आगन्तव्यमिति निश्चयः”। अतस्तेषां तत्कुलिशपातोपमं वचः समाकर्ण्य अनागतविधाता सर्वान्मत्स्यान् आहूय इदमूचे,— “अहो ! श्रुतं भवद्भिः यन्मत्स्यजीविभिरभिहितम् ! तत् रात्रावपि गम्यतां कथञ्चिन्निकटं सरः । उक्तञ्च—

किसी एक सरोवरमे अनागतविधाता प्रत्युत्पन्नमति और यद्भविष्य तीन मत्स्य रहतेथे, तब उस जलाशयको देखकर जाते हुए मत्स्यजीवियोंने कहा— “अहो ! यह ह्रद बहुतसी मछलियोवाला है, हमने कभी इसकी खोज न की । सो आज तो आहारवृत्ति हो चुकी और सन्ध्या भी होगई । सो प्रात काल यहा आओ यह निश्चय है” । तब वज्रपातके समान उनके वचनको श्रवणकर अनागतविधाता सब मछलियोको बुलाकर यह बोला,— “अहो सुना आपने जो धीमरोंने कहा ? सो रातमेही किसी निकटके सरोवरमें चलो । कहा है—

अशक्तेर्बलिनः शत्रोः कर्त्तव्यं प्रपलायनम् ।
संश्रितव्योऽथवा दुर्गो नान्या तेषां गतिर्भवेत् ॥ ३४८ ॥

असमर्थोंको बलवान् शत्रुओंके निकटसे पलायन करना चाहिये अथवा दुर्गमें स्थिति करे उनको दूसरी गति नहीं है ॥ ३४८ ॥

तन्नूनं प्रभातसमये मत्स्यजीविनोऽत्र समागम्य मत्स्यसंक्षयं करिष्यन्ति एतन्मम मनसि वर्त्तते । तन्न युक्तं साम्प्रतं क्षणमपि अत्रावस्थातुम् । उक्तञ्च—

सो अवश्यही प्रभातसमय मत्स्यजीवी यहा आकर मत्स्योका नाश करेंगे यह मेरे मनमें वर्तता है सो इस समय क्षणमात्र भी यहा रहना उचित नहीं है । कहा है—