भारतकोश
पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)

Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary

पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा

DevanagariSanskritpublished536 पृष्ठ

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( १८२ ) पञ्चतन्त्रम् ।

सो हे मूर्ख ! सिखाया हुआ भी तून सीखा । अथवा तेरा दोष नहीं है साधुमें शिक्षा गुणके निमित्त होतीहै असाधुमें नहीं । कहाहै-

किं करोत्येव पाण्डित्यमस्थाने विनियोजितम् ।
अन्धकारप्रतिच्छन्ने घटे दीप इवाहितः ॥ ४२५ ॥

अनुचित स्थानमें लगाई पंडिताई क्या कर सकतीहै जैसे अंधकारसे पूर्ण घडेके ऊपर धरा हुआ दीपक ( उसके भीतरका अंधकार दूर नहीं कर सकता ) ॥ ४२५ ॥

तद्व्यर्थपाण्डित्यमाश्रित्य मम वचनमशृण्वन् न आत्मनः शान्तिमपि वेत्सि, तन्नूनमपजातः त्वम् । उक्तञ्च-

सो वृथा पांडित्यका आश्रय कर मेरे वचन न सुने न अपनी शान्तिको भी जाना सो अवश्यही तू विजातीयहै । कहा है-

जातः पुत्रोऽनुजातश्च अतिजातस्तथैव च ।
अपजातश्च लोकेऽस्मिन्मन्तव्याः शास्त्रवेदिभिः ॥ ४२६ ॥

इस संसारमें शास्त्रके जाननेवाले जात, अनुजात, अतिजात और अपजात यह चार प्रकारके पुत्र कहते हैं ॥ ४२६ ॥

मातृतुल्यगुणो जातस्त्वनुजातः पितुः समः ।
अतिजातोऽधिकस्तस्मादपजातोऽधमाधमः ॥ ४२७ ॥

माताके तुल्य गुणवाला जात, पिताके तुल्य गुणवाला अनुजात, पितासे अधिक अतिजात और अपजात अधमाधम कहाता है ॥ ४२७ ॥

अप्यात्मनो विनाशं गणयति न खलः परव्यसनहृष्टः ।
प्रायो मस्तकनाशे समरमुखे नृत्यति कबन्धः ॥ ४२८ ॥

पराये दुःखसे प्रसन्न हुआ दुष्ट अपने नाशको नहीं गिनताहै प्रायः मस्तकके नाश होनेमेंभी कबन्ध समरमें नृत्य करता है॥ ४२८ ॥

अहो ! साधु चेदमुच्यते ।
अहो ! यह सत्य कहा है कि-

धर्म्मबुद्धिः कुबुद्धिश्च द्वावेतौ विदितौ मम ।
पुत्रेण व्यर्थपाण्डित्यात्पिता धूमेन घातितः ॥ ४२९ ॥