पञ्चतन्त्रम् (संस्कृत मूल एवं भाषा टीका सहित)
Panchatantram with Sanskrit & Hindi Commentary
पं. विष्णु शर्मा / पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६८ ) पञ्चतन्त्रम् ।
“सूर्य, चन्द्रमा, पवन, अग्नि, स्वर्ग, पृथ्वी, जल, हृदय, यम, दिनरात्रि, दोनों संध्या और धर्म मनुष्यके कर्तव्यको जानता है ॥ ४३८ ॥
भगवति वनदेवते ! आवयोर्मध्ये यः चौरः त्वं कथय” . अथ पापबुद्धिपिता शमीकोटरस्थः प्रोवाच—“भोः ! शृणुत शृणुत धर्मबुद्धिना हतमेतद्धनम्” । तदाकर्ण्य सर्वे ते राजपुरुषा विस्मयोत्फुल्ललोचना यावद्धर्मबुद्धेः वित्तहरणोचितं निग्रहं शास्त्रदृष्ट्या अवलोकयन्ति तावद्धर्मबुद्धिना तच्छमीकोटरं वह्निभोज्यद्रव्यैः परिवेष्ट्य वह्निना सन्दीपितम् । अथ ज्वलति तस्मिन् शमीकोटरेऽर्द्धदग्धशरीरः स्फुटितेक्षणः करुणं परिदेवयन् पापबुद्धिपिता निष्क्राम । ततश्च तैः सर्वैः पृष्टः—“भोः ! किमिदम् ?” इत्युक्ते स पापबुद्धिविचेष्टितं सर्वमिदं निवेदयित्वा उपरतः । अथ ते राजपुरुषाः पापबुद्धिं शमीशाखायां प्रलम्ब्य धर्मबुद्धिं प्रशस्य इदमूचुः—“अहो ! साधु चेदमुच्यते—
भगवति वनदेवते ! हम दोनोंके बीचमें जो चोरहो उसको तुम कहो” तत्र पापबुद्धिका पिता शमीकी खखोडलमेंसे बोला--“भो ! सुनो २ यह धन धर्मबुद्धिने हरण किया है” यह सुनकर वे सब राजपुरुष विस्मयसे खिले नेत्रवाले जबतक धर्मबुद्धिको धनहरणके उचित दंडको शास्त्रदृष्टिसे देखते हैं तबतक धर्मबुद्धिने उस शमीकी खखोडल अग्निभोज्य ( तृणादि ) द्रव्यसे ढककर उसमें आग लगादी । तब उस शमीकोटरके जलनेपर अर्ध दग्धशरीरवाला नेत्रफूटा करुणास्वरसे चिल्लाता हुआ पापबुद्धिका पिता निकला. तब उन सबने पूछा--“भोः ! यह क्या है ?” । ऐसा कहनेपर वह इस सब पापबुद्धिकी चेष्टाको निवेदन कर मरगया । तब वे राजपुरुष पापबुद्धिको शमीशाखामें बांधकर धर्मबुद्धिकी प्रशंसा कर यह बोले--“अहो ! यह सत्य कहा है—
उपायं चिन्तयेत्प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् । पश्यतो बकमूर्खस्य नकुलेन हता बकाः ॥ ४३९ ॥”
बुद्धिमान् उपायकी चिन्ता कर अपायकीभी चिन्ता करे। मूर्ख बगलेके देखते नौलेने उसके बच्चे खालिये ॥ ४३९ ॥”